घड़ियाली दियो निकाल नी
घड़ियाली दियो निकाल नी,
अज पिया घर आइआ लाल नी।
घड़ी-घड़ी घड़ियाल बजावे, रैण वसल दी पिया घटावे,
मेरे मन दी बात जे पावे, हत्थों चा सुट्टे घड़िआल नी।
अज पिया घर आइआ लाल नी।
अनहद बाजा बजे सुहाणा, मुतरिब सुघड़ा तान तराना,
भुल्ला सौम सलात दुगाना, मध प्याले देण कलाल नी।
अज पिया घर आइआ लाल नी।
मुख वेखण दा अजब नज़ारा, दुख दलिद्दर दा उठ गिया सारा,
रैण बधे कुछ करो पसारा, दिन अग्गे धरो दिवाल नी।
अज पिया घर आइआ लाल नी।
टूणे टामण किये बधेरे, सिहरे आये वड-वडेरे,
तो जानी घर आइआ मेरे, लख वर्डे रहां ओहदे नाल नी।
अज पिया घर आइआ लाल नी।
बुल्ल्हिआ शौह दी सेज पिआरी, नी मैं तारनहारे तारी।
किंवे किंवे मेरी आई वारी, हुण विछड़ण होइया मुहाल नी।
अज पिया घर आइआ लाल नी।
~ बाबा बुल्लेशाह
घड़ियाली दियो निकाल नी,
अज पिया घर आइआ लाल नी।
घड़ियाँ हटा दो, समय का हिसाब मिटा दो —
आज प्रियतम स्वयं घर आए हैं।
आध्यात्मिक अर्थ:
जब चेतना अपने स्रोत से मिलती है, तब समय अर्थहीन हो जाता है।
जहाँ मिलन है, वहाँ प्रतीक्षा नहीं रहती।
घड़ी-घड़ी घड़ियाल बजावे, रैण वसल दी पिया घटावे,
मेरे मन दी बात जे पावे, हत्थों चा सुट्टे घड़िआल नी।
बार-बार समय की टिक-टिक मिलन की रात को छोटा कर रही है।
काश वह मेरे मन की बात जान ले — और समय को ही गिरा दे।
आध्यात्मिक अर्थ:
समय केवल अहं की रचना है।
जहाँ प्रेम पूर्ण होता है, वहाँ समय बाधा बन जाता है।
अनहद बाजा बजे सुहाणा, मुतरिब सुघड़ा तान तराना,
भुल्ला सौम सलात दुगाना, मध प्याले देण कलाल नी।
अंदर अनहद नाद गूंज रहा है, दिव्य संगीत बह रहा है।
सारी औपचारिक साधनाएँ भूल गईं, अब तो प्रेम का मदिरा-पान है।
आध्यात्मिक अर्थ:
जब साधक स्वयं में उतरता है,
तो साधना मिट जाती है — केवल रस बचता है।
मुख वेखण दा अजब नज़ारा, दुख दलिद्दर दा उठ गिया सारा,
रैण बधे कुछ करो पसारा, दिन अग्गे धरो दिवाल नी।
उसका मुख देखते ही सारे दुःख-दरिद्र मिट गए।
रात को बढ़ा दो, दिन को रोक दो — यह मिलन ठहर जाए।
आध्यात्मिक अर्थ:
साक्षात्कार के क्षण में समय रुक जाता है।
जहाँ पूर्णता है, वहाँ अभाव नहीं रहता।
टूणे टामण किये बधेरे, सिहरे आये वड-वडेरे,
तो जानी घर आइआ मेरे, लख वर्डे रहां ओहदे नाल नी।
कितने ही उपाय किए, कितने ही साधन साधे।
अब जब वह स्वयं आया है — मैं लाखों जन्म उसके संग रहूँ।
आध्यात्मिक अर्थ:
साधना का फल साध्य नहीं, मिलन है।
खोज समाप्त होती है, अस्तित्व आरम्भ होता है।
बुल्ल्हिआ शौह दी सेज पिआरी, नी मैं तारनहारे तारी।
किंवे किंवे मेरी आई वारी, हुण विछड़ण होइया मुहाल नी।
बुल्ले कहता है — प्रिय की सेज ही मेरी मुक्ति है।
कितने युगों बाद यह मिलन हुआ — अब बिछुड़ना असंभव है।
आध्यात्मिक अर्थ:
जब आत्मा अपने स्रोत से मिलती है,
तो मुक्ति कोई लक्ष्य नहीं — स्वाभाविक स्थिति बन जाती है।
सार
यह भजन प्रेम की चरम अवस्था का गीत है —
जहाँ साधक और साध्य का भेद मिट जाता है।
जब प्रिय आता है,
तब समय गिर जाता है।
साधना छूट जाती है।
शब्द मौन हो जाते हैं।तब न साधक बचता है,
न साध्य —
केवल मिलन रहता है।
यह प्रेम की पूर्णता है,
जहाँ परम दूर नहीं,
घर आ चुका है।
घड़ियाली दियो निकाल नी || आचार्य प्रशांत, बाबा बुल्लेशाह पर (2023) - YouTube.