हमन है इश्क मस्ताना
हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ?
रहें आज़ाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ?
जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते,
हमारा यार है हम में, हमन को इंतजारी क्या ?
खलक सब नाम अपने को, बहुत कर सिर पटकता है,
हमन गुरनाम साँचा है, हमन दुनिया से यारी क्या ?
न पल बिछुड़े पिया हमसे, न हम बिछड़े पियारे से,
उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ?
कबीरा इश्क का माता, दुई को दूर कर दिल से,
जो चलना राह नाजुक है, हमन सिर बोझ भारी क्या ?
~ कबीर साहब
“हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ?
रहें आज़ाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ?”
मेरा प्रेम मस्त है, गणना और चतुराई से परे।
दुनिया से जुड़े रहें या न रहें —
हमें उससे दोस्ती की क्या आवश्यकता?
आध्यात्मिक अर्थ:
जहाँ प्रेम पूर्ण है, वहाँ होश का बोझ नहीं रहता।
जो सत्य में स्थित है, उसे संसार से सहारे की ज़रूरत नहीं।
“जो बिछुड़े हैं पियारे से, भटकते दर-ब-दर फिरते,
हमारा यार है हम में, हमन को इंतजारी क्या ?”
जो अपने प्रिय से बिछुड़े हैं, वे दर-दर भटकते हैं।
मेरा यार मेरे भीतर ही है —
मुझे प्रतीक्षा कैसी?
आध्यात्मिक अर्थ:
खोज उसी की होती है जो दूर हो।
जब सत्य भीतर मिल जाए, तो भटकन समाप्त हो जाती है।
“खलक सब नाम अपने को, बहुत कर सिर पटकता है,
हमन गुरनाम साँचा है, हमन दुनिया से यारी क्या ?”
संसार अपने-अपने नामों में उलझकर सिर पटकता है।
मेरा सहारा तो गुरु का सच्चा नाम है —
फिर दुनिया से मित्रता कैसी?
आध्यात्मिक अर्थ:
नाम और पहचान अहंकार को बाँधते हैं।
गुरु-नाम पहचान नहीं देता, पहचान मिटा देता है।
“न पल बिछुड़े पिया हमसे, न हम बिछड़े पियारे से,
उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ?”
न एक क्षण भी प्रिय मुझसे अलग हुआ,
न मैं प्रिय से अलग हुआ।
जब उसी से प्रेम लगा है,
तो बेचैनी कैसी?
आध्यात्मिक अर्थ:
विरह वहाँ होता है जहाँ दूरी मानी जाती है।
अभेद में प्रेम स्थिर हो जाता है।
“कबीरा इश्क का माता, दुई को दूर कर दिल से,
जो चलना राह नाजुक है, हमन सिर बोझ भारी क्या ?”
कबीर इश्क का मतबारा,
दिल से द्वैत को हटा दो।
यह मार्ग सूक्ष्म है —
इस पर भारी बोझ कैसे चले?
आध्यात्मिक अर्थ:
सत्य का मार्ग सरल है, पर हल्के होने की माँग करता है।
अहंकार का भार वहाँ नहीं चल सकता।
सार
यह भजन प्रेम का उन्माद नहीं, पूर्णता की घोषणा है।
यह कहता है —
जहाँ यार भीतर मिल जाए,
वहाँ संसार, प्रतीक्षा और बेचैनी
सब अर्थहीन हो जाते हैं।
इश्क यहाँ चाह नहीं,
पहचान का विसर्जन है।
और जब “दुई” गिर जाती है,
तो केवल वही बचता है
जो सदा से एक है।