अष्टावक्र गीता 13.4, 13.5 — मैं सारे बंधन परे आनंद में स्थित हूँ

अष्टावक्र गीता - श्लोक 13.4, 13.5
वेदांत संहिता | 09 दिसम्बर 2025

“मेरा हित और अहित न तो ठहरने से होता है, न चलने से और न ही सोने से; इसलिए ठहरते हुए, चलते हुए और सोते हुए भी, मैं आनंद में स्थित हूँ।”

“देह में स्थित योगी की तरह, मैं कर्म और अकर्म — दोनों के बंधनों से रहित स्वभाव वाला हूँ। संयोग और वियोग — दोनों से रहित, मैं आनंद में स्थित हूँ”

क्या मेरा हित और अहित बाहरी गतिविधियों पर निर्भर है?
मेरा हित और अहित न ठहरने से, न चलने से, न सोने से होता है।
सुख-दुख, हित-अहित सब अहंकार की अवस्थाएँ है ।
चाहे मैं स्थिर रहूँ, चलता रहूँ या सोऊँ, मैं आनंद में हूँ।
शरीर और मन को सुख-दुख होते होंगे लेकिन मेरा चेतन्य तो आनंद में स्थित हूँ ।

कर्म और अकर्म का बंधन क्या है?
मैं देह में स्थित योगी की तरह, कर्म और अकर्म दोनों के बंधनों से मुक्त हूँ।
अहंकार सोचता है कि जो गति है उसका कोई कर्ता तो जरूर होगा ।
“मैं कर्ता हूँ” ही सारे दुख की वजह बनता है । वास्तविकता में सब प्रकृति की गति है ।
संयोग और वियोग—जोड़ना और अलग होना—इन दोनों से रहित होना ही वास्तविक आनंद है।

अहंकार और आत्मा में अंतर क्या है?
अहंकार वह “मैं” है जिसमें विषय जुड़ा होता है; आत्मा वह “मैं” है जो बंधनों से परे है।
अनुभव केवल गुजरते दृश्य हैं। जब उन्हें साक्षी भाव से देखा जाए, अहंकार स्वयं ही मिटता है।

क्या आनंद बाहरी परिस्थितियों में है?
जीब और जगत एक हैं; दोनों मिट्टी हैं।
जब तक अहंकार शोर मचाता है, हम यह नहीं जानते कि सब मिट्टी है।
साक्षी का अर्थ है अपने आप को मिट्टी देखना और प्रकृति के खेल को निरीक्षण करना।

कैसे मुक्ति संभव है?
बाहरी घटनाओं, कर्मों और वस्तुओं के पीछे भागना मूर्खता है।
वास्तविक आनंद का स्रोत यह जानना है कि मैं अनुभवों में नहीं, अनुभवों के निरीक्षण में स्थित हूँ।
जब मैं केवल देखता हूँ, साक्षी रहता हूँ और अहंकार से मुक्त हूँ, तभी मुक्ति है।

अंतिम निष्कर्ष
हित-अहित, संयोग-वियोग, कर्म-अकर्म—सब अनुभव हैं, कोई स्थायी कर्ता नहीं।
अपने आप को साक्षी बनाओ। अहंकार छोड़ो। बाहरी दोषों में मत फँसो। भीतर देखो।
यही अष्टावक्र गीता 13.4 और 13.5 का संदेश है।