अष्टावक्र गीता श्लोक 13.7 — आनंद सुख-दुःख के अभाव का नाम है

अष्टावक्र गीता — श्लोक 13.7
वेदान्त संहिता सत्र | 2 फ़रवरी

भावों में सुख-दुःख, शुभ-अशुभ का कोई स्थायी नियम नहीं है। जो इन्हें बार-बार स्पष्ट देख चुका है, वह इनसे परे हो जाता है और आनंद में स्थित रहता है। यह आनंद किसी अनुभव की ऊँचाई नहीं, बल्कि अनुभवकर्ता के मिट जाने का परिणाम है।

यह बात किसके लिए कही जा रही है
यह संवाद ऊँच-नीच, लाभ-हानि, शुभ-अशुभ से आगे का है। जिसके लिए सुख और दुःख अर्थ रखते थे, वही अपने ही प्रकाश में लीन हो गया। सुख को भोगने-देखने वाला मिट गया। उसके साथ ही सुख की ज़रूरत भी मिट गई। वह प्रकृति का था, इसलिए मिथ्या था। उसी के लिए सब तराज़ू थे, सब हिसाब थे। जब वह नहीं रहा, तो कुछ भी नहीं बचा।

सुख वास्तव में किसके लिए होता है
सुख हमेशा किसी के लिए होता है। और वही “कोई” अपने लिए सुख की परिभाषा गढ़ता है। एक ही परिणाम किसी के लिए सुख बनता है, किसी के लिए दुःख। यह अपूर्ण बैठे अहंकार की बात है। जहाँ कामना पूरी होती दिखती है—वह सुख कह देता है। जहाँ कामना टूटती दिखती है—वह दुःख कह देता है।

सुख–दुःख दबाने की चाल
जब सुख–दुःख को दबाने की कोशिश होती है, तो जो इनके लिए था—अहंकार—वह बच निकलता है। विषयों का त्याग हो सकता है, विषयों की निंदा हो सकती है, लेकिन अहंकार बिना छुए निकल जाता है। “सुख श्रेष्ठ है, दुःख हीन है”—यह अहंकार की भाषा है।

लोकज्ञान और आत्मज्ञान का फर्क
लोकज्ञान कहता है—सुख और दुःख को एक-सा मान लो।
आत्मज्ञान कहता है—अहंकार को देखो, और जो जैसा है वैसा ही देखो।
यहाँ कोई अवस्था श्रेष्ठ नहीं बनती। यहाँ कोई आदर्श नहीं रचा जाता।

परमार्थ कोई अवस्था नहीं
परमार्थ कोई अवस्था नहीं है। सारी अवस्थाएँ अहंकार की हैं। इसीलिए अहंकार मुक्ति और परमार्थ को भी अपनी अवस्था बनाना चाहता है। लोकधर्म मुक्त-पुरुष की कहानियाँ गढ़ता है। सत्य कहानी नहीं है।

आनंद और दुःख का संबंध
यह कहना कि आनंद और दुःख एक-दूसरे के विपरीत हैं—यह भी अहं की धारणा है। व्यक्तिगत दुःख तब नहीं बचता जब अहं नहीं बचता। फिर भी सृष्टि में दुःख है। दोनों साथ-साथ चल सकते हैं। आत्मज्ञानी कहता है—“सुख होता है, दुःख होता है, अहं नहीं होता।”

निष्काम कर्म का अर्थ
सत्य के लिए संघर्ष होगा, और दुःख भी मिलेगा। आत्मज्ञानी उसे स्वीकार करता है—आनंद में स्थित होकर। यही निष्काम कर्म है। युद्ध से भागना नहीं, बल्कि सत्य के लिए खड़े होना—बिना अपने लिए कुछ माँगे।

आर्थिक निर्भरता का सच
“यह चाहिए, वह चाहिए”—तो किसी की नौकरी करनी पड़ेगी। अर्थ यह नहीं कि पैसे की कमी समस्या है। समस्या है ज़्यादा की कामना। जो छीना जा सकता है, वह कभी तुम्हारा था ही नहीं। बंदर तुम्हारे ऊपर नहीं चढ़े—वे तुम्हारे केले के बोझ पर चढ़े हैं। बस उसे छोड़ दो।

अद्वैत की सीधी परिभाषा
द्वैत के एक सिरे पर वह “मैं” होता है जो सवाल पूछता है। और वह हमेशा दूसरे सिरे पर अपने विषय के साथ होता है। जब अहंकार खुद को मुड़कर देख लेता है, तो अद्वैत है। जब दिख जाता है कि अहंकार मिथ्या है, तो न वह बचता है, न उसका विषय। कर्म तब भी होते हैं—लेकिन अहंकार के बिना। जब “अद्वैत” कहने को भी कोई नहीं बचता—वही अद्वैत है।

सत्य और समाज
गीता-समाज में आना मतलब सत्य को सर्वोपरि मानना है। सत्य को सर्वोपरि रखने वाला अंधकार से समझौता नहीं करता—अंधकार को सत्य से झकझोरना पड़ता है; और यही करुणा है।

आनंद का निष्कर्ष
आनंद कोई भावना नहीं है। आनंद अहंकार के अभाव का नाम है। सुख-दुःख रह सकते हैं। लेकिन जब “मैं” नहीं है, तो व्यक्तिगत दुःख नहीं बचता। और वहीं—आनंद स्थित होता है।

श्लोक, अन्वय, अनुवाद

श्लोक:
सुखादिरूपाऽनियमं भावेष्वालोक्य भूरिशः ।
शुभाशुभे विहायास्मादहमासे यथासुखम् ॥ 13-7 ॥

अन्वय:
भावेषु = भावों में; सुखादिरूपा (सुख + आदि + रूपा) = सुख आदि रूपों का; अनियमम् = कोई निश्चित नियम नहीं है; भूरिशः = (ये) बार-बार; आलोक्य = भली-भाँति देखते हुए; शुभाशुभे = शुभ और अशुभ; विहाय = (दोनों से) परे; अस्मात् = इस प्रकार; अहम् = मैं; यथासुखम् = आनंद में; आसे = स्थित हूँ

अनुवाद:
भावों में सुख आदि रूपों का कोई निश्चित नियम नहीं है—ये बार-बार भली-भाँति देखते हुए शुभ और अशुभ दोनों से परे, इस प्रकार मैं आनंद में स्थित हूँ।