कबीर के दोहे
विषय वासना उरझि कर, जनम गंवाया बाद।
अब पछितावा क्या करै, निज करनी कर याद।।
सोना सज्जन साधुजन, टूट जुड़े सौ बार।
दुर्जन कुंभ कुम्हार के, एके धक्का दरार।।
मरण भला तब जानिए, छूट जाए हंकार।
जग की मरनी क्यों मरें, दिन में सौसौ बार।।
साधो रण में मिट रहा, टूटन दे हंकार।
जग की मरनी क्यों मरें, दिन में सौसौ बार।।
बहता पानी निर्मला, बंधे सो गंदा होए।
साधु जन रमता भला, दाग न लागे कोये।।
आग आंच सहना सुगम, सुगम खड़ग की धार।
नेह निबाहन एक रस, महा-कठिन व्यवहार।।
कबीरा यह संसार है, जैसा सेमल फूल।
दिन दस के व्यवहार में, झूठे रंग ना भूल।।
गगन दमामा बाजिया, पड़े निसाने घाव।
खेत बुहारे सूरमा, मोहे मरण का चाव।।
सूरा सोई सराहिये, लड़े मुक्ति के हेत।
पुर्जा पुर्जा कट पड़े, तो भी ना छोड़े खेत।।
मोटी माया सब तजै, झीनी तजी न जाय।
पीर पैगम्बर औलिया, झीनी सबको खाय।।
माया तो ठगनी भई, ठगत फिरै सब देस।
जा ठग ने ठगनी ठगी, ता ठग को आदेश।।
भीतर तो भेदा नहीं, बाहिर कथै अनेक।
जो पाई भीतर लखि परै, भीतर बाहर एक।।
माया दोय प्रकार की, जो कोय जाने खाय।
एक मिलावे राम से, एक नरक ले जाय।।
माया छोड़न सब कहे, माया छोड़ी न जाय।
छोड़न की जो बात करूं, बहुत तमाचा खाय।।
माया मन की मोहिनी, सुर नर रहे लुभाय।
इन माया सब खाइया, माया कोय न खाय।।
दौड़त दौड़त दौड़िया, जेती मन की दौड़।
दौड़ि थके मन थिर भया, वस्तु ठौर की ठौर।।
ज्ञानी भूले ज्ञान कथि, निकट रहा निज रूप।
बाहिर खोजै बापुरै, भीतर वस्तु अनूप।।
राम नाम कड़वा लगे, मीठा लागे दाम।
दुविधा में दोनों गए, माया मिली ना राम।।
जिहि घट प्रीति न प्रेम रस, पुनि रसना नहीं राम।
ते नर इस संसार में, उपजि भए बेकाम।।
जल में बसे कुमुदनी, चंदा बसे अकास।
जैसी जिसकी भावना, सो ताही के पास।।
मनुवा तो पंछी भया, उड़ि के चला अकास।
ऊपर ही ते गिर पड़ा, मन माया के पास।।
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोए।
जो मन खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोए।।
सुख के संगी स्वारथी, दुःख में रहते दूर।
कहैं कबीर परमारथी, दुःख सुख सदा हजूर।।
दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार।
तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार।।
जहाँ काम तहाँ नाम नहीं, जहाँ नाम नहि काम।
दोनो कबहू ना मिलै, रवि रजनी एक ठाम।।
साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाए।।
प्रेम पियाला जो पिये, शीश दच्छिना देय।
लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय।।
आपा मेटे हरि मिले, हरि मेटे सब जाई।
अकथ कहानी प्रेम की, कोई नहीं पतियाय।।
राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय।
जो सुख साधू संग में, सो बैकुंठ ना होय।।
प्रीति बहुत संसार में, नाना विधि की सोय।
उत्तम प्रीति सो जानिये, सतगुरु से जो होय।।
सुरति करो मेरे सांइया, हम है भवजल मांहि।
आपे ही बहि जाएंगे, जो नहीं पकड़ो बांहि।।
चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।
जिनको कुछ नहीं चाहिए, वे शाहन के शाह।।
आए हैं सो जायेंगे, राजा रंक फकीर।
एक सिंहासन चढ़ चले, एक बंधें जंजीर।।
सहकामी सुमिरन करै, पावै उत्तम धाम।
निष्कामी सुमिरन करै, पावै अविचल राम।।
बैद मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार।
एक कबीरा ना मुआ, जाके राम आधार।।
वृक्ष बोला पात से, सुन पत्ते मेरी बात।
इस घर की ये रीति है, एक आवत एक जात।।
मांस मांस सब एक है, मुर्गी हिरनी गाय।
आंख देखी नर खात है, ते नर नरकहिं जाए।।
झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद।
जगत चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद।।
अपना तो कोई नहीं, देखा ठोक बजाय।
अपना अपना क्या करे, मोह भरम लपटाय।।
रचनहार को जान ले, खाने को क्या रोय।
मन मंदिर में पैठ के, तान पिछोरी सोय।।
गुरु को मानुष जानते, ते नर कहिए अन्ध।
होय दुखी संसार में, आगे जम की फन्द।।
मन के हारे हार हैं, मन के जीते जीत।
कहै कबीर हरि पाइए, मन ही की परतीत।।
साधो संगत साधु की, जौ की भूसी खाय।
खीर खांड भोजन मिलै, साकट संग न जाय।।
प्रेम बिना नहीं भेष कुछ, नाहक का संवाद।
प्रेम भाव जब लग नहीं, तब लग बाद विवाद।।
हाड़ जलै ज्यों लाकड़ी, केस जलै ज्यों घास।
सब जग जलता देख के, भए कबीर उदास।।
आतम अनुभव जब भयो, तब नहीं हर्श विशाद।
चित्र दीप सम होए रहै, तजि करि बाद-विवाद।।
रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय।
हीरा जन्म अमोल था, कोड़ी बदले जाय।।
कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर।
ना काहू से दोस्ती, न काहू से बैर।।
झूठा सब संसार है, कोउ न अपना मीत।
राम नाम को जानि ले, चलै सो भौजल जीत।।
जे तू राखे साइयां, मार सके ना कोय।
बाल ना बांका कर सके, जो जग बैरी होय।।
पाथर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूं पहाड़।
ता से तो चक्की भली, पीस खाए संसार।।
यह तो घर है प्रेम का, खाला का घर नाहिं।
सीस उतारे भुईं धरे, तब बैठें घर माहिं।।
प्रेम प्रेम सब कोइ कहे, प्रेम न चीन्हे कोय।
जा मारग साहब मिले, प्रेम कहावे सोय।।
हरिजन तो हारा भला, जीतन दे संसार।
हारा तो हरि सो मिले, जीता जम के द्वार।।
गुरु मिले तो सब मिला, न तो मिला न कोय।
मात पिता सुत बाँधवा, ये तो घर घर होय।।
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहीं।
प्रेम गली अति सांकरी, जामें दो न समाहीं।।