कठोपनिषद 1.2.15 — ॐ क्या है?

कठोपनिषद - 1.2.15 श्लोक
वेदांत संहिता | 17 दिसम्बर 2025

हे नचिकेता! जिस परम पद की घोषणा सभी वेद करते हैं, जिसे प्राप्त होने के लिए सभी तप किए जाते हैं, और जिसकी इच्छा रखते हुए ब्रह्मचर्य को जीवन शैली बनाया जाता है — उसी परम पद के बारे में मैं तुम्हें संक्षेप में बताता हूँ — यही वह “ॐ” है।


ॐ का अर्थ और अनुभव क्या है?
ॐ केवल एक शब्द या ध्वनि नहीं है; यह तीन अवस्थाओं — जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति — का प्रतीक है। ‘अ’ में सभी जागरूक अनुभव होते हैं, ‘उ’ में सोते हुए अनुभव और ‘म’ में गहरी नींद या सुषुप्ति। जीवन के सभी अनुभव इसी तीन स्थितियों के माध्यम से आते हैं। ॐ का पूर्ण अर्थ तभी समझ में आता है जब हम मोन में रहते हैं, यानी स्वयं का अहंकार और भ्रम दूर कर, आत्मनुभव में स्थित रहते हैं। मोन का मतलब है आतमस्त होना, अहंकार के तीनों रूपों से परे जाना।


ॐ और ब्रह्मचर्य का संबंध क्या है?
ब्रह्मचर्य केवल जीवन शैली नहीं, बल्कि दृष्टि का अभ्यास है। तीनों अवस्थाओं का निरीक्षण करना ब्रह्मचर्य का वास्तविक अर्थ है। जब आप ‘अ’, ‘उ’, ‘म’ के अनुभवों से गुजरते हैं और उन्हें मोन की दृष्टि से देखते हैं, तभी अहंकार के खेल से परे रहकर जीवन को मुक्ति की ओर ले जाते हैं। ॐ का जप करना केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि सत्य और परमार्थ का स्मरण है। ॐ कोई नाम नहीं, कोई पहचान नहीं; यह सभी नामों और बंधनों से मुक्ति का प्रतीक है।


जीवन और अनुभव का उद्देश्य क्या है?
जीवन का उद्देश्य केवल अनुभव लेना है, अपने आप को जानना है। अहंकार वही है जो अनुभवों में फंसा रहता है और स्वयं को जीव मानता है। आत्मा वही है जो विषयों के परे है। अनुभव हमें स्वयं की प्रकृति और ब्रह्मांड की सच्चाई से परिचित कराते हैं। यदि कोई वस्तु या अनुभव लुभाता है, तो सोचो कि वह अनुभव कैसे और क्यों हो रहा है; यह निरीक्षण जीवन में ब्रह्मचर्य और आत्मज्ञान का मार्ग खोलता है।


अंत में क्या संदेश है?
ॐ हमें यह याद दिलाता है कि व्यवहारिक जीवन और परमार्थ अलग नहीं हैं। अ, उ, म की ध्वनियों में डूबकर, मोन में रहकर, अहंकार से मुक्त होकर हम जीवन की वास्तविकता को देख सकते हैं। यही परम पद है, जिसके लिए सभी वेद तप करते हैं और ब्रह्मचर्य अपनाते हैं। यही वह ‘ॐ’ है, जो केवल जपने या सुनने का विषय नहीं, बल्कि अनुभव और आत्मनिरीक्षण का प्रतीक है।


निष्कर्ष
ॐ तीन अवस्थाओं का प्रतीक है — जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति। मोन में रहकर हम अहंकार की तीनों अवस्थाओं से परे जा सकते हैं। जीवन और परमार्थ को एक करने का यह साधन है। अनुभव केवल बाहरी नहीं, आत्मनिरीक्षण के माध्यम से हम स्वयं और ब्रह्मांड की सच्चाई को जान सकते हैं।