कठोपनिषद 1.2.16 — अक्षर को जानना ही इच्छा-समाप्ति है
कठोपनिषद - 1.2.16
वेदांत संहिता | 17 जनवरी 2026
निश्चित रूप से यही अक्षर ब्रह्म है और यही अक्षर परम है।
जो इस अक्षर को जान लेता है, उसकी जो भी इच्छा होती है, वही उसे प्राप्त हो जाती है।
भ्रम: इच्छा-पूर्ति बाहर से होती है
कहा गया है — अक्षर को जान लेने से सारी इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं।
लेकिन मन तुरंत कहता है:
तो फिर IIT–JEE, नौकरी, पैसा, उपलब्धि किसलिए?
असल में हमने इच्छा-पूर्ति को वस्तुओं से जोड़ दिया है।
इसलिए लगता है कि दौड़ से मिलेगा, संघर्ष से मिलेगा, साबित करने से मिलेगा।
दर्द और दौड़ का सीधा संबंध
जिसे दर्द होता है, वही चिल्लाता है।
जो स्वस्थ है, वह शांत बैठा रहता है।
जो चटपटाता है, वही भागता है —
चाहे समाज उसे “achiever” या “go-getter” कह दे।
जानने वालों ने साफ़ कहा है:
दौड़ का स्रोत उपलब्धि नहीं, अहम की अपूर्णता है।
लक्ष्य कहाँ से आते हैं
दुनिया कहती है —
“बड़ी चीज़ें हैं, उन्हें पा लो, सब ठीक हो जाएगा।”
लेकिन ज़्यादातर लक्ष्य
हवाओं से उठे विचार होते हैं,
स्वयं से उपजे नहीं।
और अगर कोई कह दे कि
40 साल जिस चीज़ के पीछे भागे, वह व्यर्थ थी —
तो अहंकार शर्म से टूट जाएगा।
इसलिए वह मानने से इंकार कर देता है।
समस्या बाहर नहीं, दिशा में है
कोई तुम्हें थप्पड़ मारे — तुम चिल्लाओगे।
कोई और पिटे — तुम उसे गले लगा लोगे।
समस्या घटना नहीं है,
समस्या अपनी पहचान से चिपकाव है।
असल प्रश्न यह नहीं कि तुम दौड़ रहे हो,
प्रश्न यह है —
कहीं दिशा ही गलत तो नहीं?
इतिहास का साफ़ उत्तर
क्या दौड़ने वालों को कभी कुछ नहीं मिला?
मिला —
जो भी वस्तु मिल सकती थी, मनुष्य ने पा ली।
फिर भी शांति नहीं मिली।
क्योंकि
“मैं” वही रहा, केवल ऑब्जेक्ट बदलता रहा।
वस्तु-त्याग बनाम दृष्टि
लोकधर्म कहता है —
“वस्तुओं को त्याग दो।”
दूसरी ओर संसार कहता है —
“जितना समेट सको, समेट लो।”
दोनों ही चूक जाते हैं,
क्योंकि दोनों कर्ता को नहीं देखते।
सब ऑब्जेक्ट्स को देखते हैं,
सब्जेक्ट कभी दृष्टि में आता ही नहीं।
यही माया है —
“मैं” को न देख पाना।
खेल की पहचान
अगर दिख जाए कि
मज़े करने वाला ही झूठ है,
तो फिर कोई समस्या नहीं बचती।
फिर सब क्रीड़ा बन जाता है।
न तनाव, न डर —
और काम अपने आप बेहतर होता है।
जो काम ज़ोर लगाकर करना पड़े,
वह तुम्हारे लिए नहीं है।
जीवन में ज़बरदस्ती की ज़रूरत नहीं होती।
अक्षर-ज्ञान का वास्तविक अर्थ
जो आत्म को जान लेता है,
वह ब्रह्म और आनंद को जान लेता है।
अब उसकी “सारी इच्छाएँ” पूरी होती हैं
क्योंकि अब
अहंकार-जनित इच्छा बचती ही नहीं।
अहंकार
अहंकार खुद को बचाना चाहता है,
इसलिए मिटने से डरता है।
जिसे सच में तकलीफ़ होती है,
वह अभिनय नहीं करता —
वह सीधे कर्म करता है।
कोई भी समस्या
आपके सहयोग के बिना नहीं चल सकती।
अहंकार को न समझने से ही
सारी लड़ाइयाँ हुईं —
पहले पत्थर, तलवार, बंदूक
और अब ICBM।
सार
अक्षर को जानना
कोई चमत्कारी इच्छा-पूर्ति नहीं है।
यह उस “मैं” का अंत है
जो अधूरा महसूस करता था।
जहाँ अधूरापन नहीं,
वहाँ इच्छा नहीं —
और जहाँ इच्छा नहीं,
वहीं वास्तविक तृप्ति है।