मैं समय में नहीं हूँ, समय मुझमे हैं
(समय, विचार और मुक्ति का दार्शनिक अवलोकन)
प्रस्तावना — समय अस्तित्व के स्तर पर समझना होगा
समय क्या है — यह प्रश्न जितना सरल लगता है उतना ही गहरा है। दुनिया भर के विचारकों ने समय की परिभाषा करने की कोशिश की, पर अधिकांश परिभाषाएँ चक्रीय निकलती हैं। जैसे — एक घंटा साठ मिनट है, एक मिनट साठ सेकंड है — लेकिन सेकंड क्या है? अंततः परिभाषा खुद को ही दोहराती रहती है। इससे स्पष्ट होता है कि समय को बाहरी माप से नहीं, बल्कि अनुभव और अस्तित्व के स्तर पर समझना होगा।
अध्याय 1 — अद्वैत से द्वैत: I और P का जन्म
ORIGIN (अद्वैत / आदि बिंदु)
│
│ विभाजन
▼
┌─────────────────────┐
│ │
I (अहं) P (प्रकृति)
Subjective Axis Objective Axis
अपूर्णता / चाहत नियम / प्रक्रिया
जब अस्तित्व महाविस्फोट से एकता से टूटकर दो में बँट जाता है — तब अनुभव की धारा शुरू होती है। इस विभाजन से बनते हैं — अहं व्रती (I) और प्रकृति व्रती (P)।
समय वहीं शुरू होता है जहाँ द्वैत शुरू होता है। जहाँ द्वैत है, वहाँ दूरी है। जहाँ दूरी है, वहाँ चाहत है। जहाँ चाहत है, वहाँ अपूर्णता है। अहं की पहचान ही अपूर्णता है। अहं स्वयं को अधूरा महसूस करता है, इसलिए वह प्रकृति से संबंध बनाता है — पूर्णता की तलाश में।
अध्याय 2 — समय: निरंतर बदलाव
I0 ───── interaction ─────► P0
│ │
▼ ▼
I1 ◄──── change ────────► P1
│ │
▼ ▼
I2 ◄──── change ────────► P2
हर संबंध दोनों को बदल देता है। जब आप किसी वस्तु के संपर्क में आते हैं तो सिर्फ वस्तु ही नहीं बदलती, आप भी बदलते हैं। जैसे मोबाइल आपके जीवन में आता है तो आपकी आदतें बदलती हैं; और आप उसे अपने तरीके से इस्तेमाल करके उसकी भूमिका भी बदल देते हैं।
द्वैत में संबंधों का अंत नहीं होता — और इन संबंधों के परिणामों की जो निरंतर धारा चलती है, उसी को हम समय कहते हैं। अपूर्णता, असंतोष और निरंतर बदलाव — यही समय है।
अध्याय 3 — चेतना, चुनाव और नियत
EVENT
│
┌───────┴────────┐
│ │
▼ ▼
P Change I Change
(Rule-based) (Intent-based)
जीवित होने का अर्थ है लगातार संसार के साथ क्रिया में रहना। लेकिन यह क्रिया कभी पूर्ण संतोष नहीं दे सकती। इसलिए समय की धारा निरंतर बहती रहती है।
तो जीव का मूल्य क्या है? चेतना यानी चुनाव। चुनाव का महत्व इस बात में है कि अगली व्यवस्था, अगली परिस्थिति शायद आपको संतुष्टि की ओर ले जाए।
लेकिन सही संबंध की निशानी क्या है? जब संबंध आदान-प्रदान के रूप में ज्ञान का होता है, तब अहं और प्रकृति दोनों बदलते हैं। उदाहरण के लिए — खाना खाने के बाद क्या आप वही रहते हैं जो पहले थे? या क्या खाना वही है जो पहले था? संबंध से दोनों का बदलना नियति है।
लेकिन रिश्ता कैसा होगा, यह आपका चुनाव तय करता है, भोजन का नहीं। अगर आप ज्यादा खाना चाहते हैं, तो भोजन इंकार नहीं करेगा। अगर आप कहते हैं खाना नहीं है, तो भोजन अपमान नहीं मानेगा।
जब यह संबंध आत्मज्ञान के साथ बनता है, तब उसमें संतुष्टि मिलने की संभावना है। यही वह स्थिति है जहाँ संबंध केवल द्वैत का नहीं रह जाता, बल्कि ज्ञान और समझ का माध्यम बन जाता है।
अध्याय 4 — दूरी का भ्रम
सब गड़बड़ तब शुरू हुई, जब अहं और प्रकृति के बीच एक फासला बना। यही दूरी भ्रम का मूल है। जब तक यह अलगाव बना रहता है, तब तक संघर्ष, आकर्षण और द्वैत चलते रहते हैं।
फासला कम होने का अर्थ क्या है? अहं अपने को चेतन कहता है और प्रकृति को जड़। दूरी तब कम होती है जब यह अलग-अलग परिभाषाएँ टूटने लगती हैं और दोनों एक ही प्रक्रिया के रूप में दिखने लगते हैं। हम कहते हैं — “मैं जीव हूँ और वह जगत है।” आकर्षण और संघर्ष तभी तक हैं जब तक दोनों अलग प्रतीत होते हैं।
ऋषि अष्टावक्र कहते हैं — प्रकृति और मुझमें कोई वास्तविक अंतर नहीं है। मैं अपने को चेतन कहता हूँ, लेकिन मेरे भीतर भी वही प्रक्रियाएँ चल रही हैं जो प्रकृति में चल रही हैं। जो नियम प्रकृति को चला रहे हैं, वही मुझे भी चला रहे हैं। जैसे नदी गुरुत्वाकर्षण का उल्लंघन नहीं करती, वैसे ही मनुष्य भी अपने जैविक, मानसिक और परिस्थितिगत नियमों से बंधा है।
धारा के पास कोई स्वतंत्र चुनाव नहीं होता; वह परिस्थिति के अनुसार बहती है। जब हम देखते हैं कि हमारे निर्णय भी शरीर, रसायन, संस्कार और परिस्थितियों से ही बन रहे हैं, तब यह भ्रम टूटता है कि कोई पूर्ण स्वतंत्र चुनाव है।
जैसे एक खंभे पर रंग चढ़ा दिया जाता है — क्या खंभे ने रंग चुनने की अनुमति दी थी? नहीं। उसी तरह मनुष्य भी अनेक प्रभावों से ढलता है। जिस दिन मनुष्य देख लेता है कि उसके और खंभे के बीच का अंतर उतना गहरा नहीं जितना वह मानता था, उसी दिन अहं और प्रकृति का फासला कम होने लगता है। और जब यह दूरी घटती है, तो समय का भ्रम भी कमजोर पड़ने लगता है।
हम अपने को संस्कारित मानते हैं, पर भीतर मुक्ति की प्यास भी होती है। धीरे-धीरे यह दिखने लगता है कि यह प्यास केवल “मेरी” नहीं, बल्कि हर कोशिका, हर प्रक्रिया और पूरे अस्तित्व में व्याप्त है। तब समझ आता है कि अगर मुक्ति है, तो वह केवल व्यक्तिगत नहीं, समग्र है — जगत सहित।
कुल मिलाकर, जो द्वैत फासला बनाता है वही भ्रम और माया है। इस दूरी को बनाने वाली शक्ति को अज्ञान या अविद्या कहा गया है। जो स्वयं को जानता ही नहीं, उसे संतोष कैसे मिलेगा? अगर हम किसी और को ही “मैं” समझ लें, तो हमें मिली औषधि भी हम दूसरों को खिला देंगे — क्योंकि पहचान ही भ्रमित है।
अध्याय 5 — काल और क्रिया
क्रिया / अनुभव
↓
(P) Object बदलता है
(I) Observer बदलता है
बार-बार मुक्ति की खोज करने वालों ने कहा है कि उन्हें काल से मुक्ति चाहिए। पर वास्तविकता यह है कि आप जीवन में जो भी क्रिया करते हैं, वह क्रिया न केवल आपको बदल देती है, बल्कि आपके देखे जा रहे अनुभव को भी बदल देती है। इसी बदलाव का नाम समय है।
समय के मूल में क्रिया है। यदि कुछ बदलता ही नहीं, तो समय भी नहीं है। जब आप किसी चीज़ को देखते हैं, तो वह अनुभव बदल जाता है। भौतिकी भी यह बताती है कि सूक्ष्मतम स्तर पर कोई वस्तु केवल देखने मात्र से अपरिवर्तित नहीं रह सकती। मापन‑प्रभाव इसी सिद्धांत को दर्शाता है।
जब आप किसी भी चीज़ के साथ थोड़ा सा भी अंतःक्रिया (interaction) करते हैं, तो दोनों — वस्तु और आप — बदल जाते हैं। उदाहरण के लिए, अगर आप किसी गाड़ी के पहिये को देखते हैं, तो केवल देखने से नहीं, बल्कि उस क्रिया से गाड़ी भी बदल जाती है और आप भी।
अनुभव से अनुभाव्य वस्तु और अनुभवकर्ता दोनों बदलते हैं, लेकिन दोनों के बदलने के नियम अलग-अलग हैं। प्रकृति बदलती है नियमों के अनुसार, जबकि अहं नियत के अनुसार बदलता है।
इसलिए जीवन में कोई घटना घटने के बाद आपके पास अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ होती हैं। आप कह सकते हैं:
- “यह किसी और की गलती है कि वह चीज़ वहाँ रखी थी।”
- “मैं कैसा इंसान हूँ जो दूसरों की चीज़ को भी सही से नहीं रख सकता।”
दोनों दृष्टिकोण आपको अलग-अलग तरीके से बदल देंगे।
अंततः, जीवन चाहे आपको कितना भी बड़ा ज्ञान दे दे, यह निर्धारित करना कि आप कितना बदलेंगे, नियत का कार्य है।
अध्याय 6 — कृष्णमूर्ति का कथन
P0 → P1 → P2 → P3
(नियम आधारित, chronological time)
I0 → I1 → I2 → I3
(नियत आधारित, psychological time)
कालक्रम के स्तर पर “कल” होता है,
पर मनोवैज्ञानिक स्तर पर कोई “कल” नहीं होता।
जब मनोवैज्ञानिक कल समाप्त हो जाता है,
तब भीतर एक गहन क्रांति घटती है।
— जिद्दू कृष्णमूर्ति
P0 → P1 → P2 — यह प्रकृति का क्रमिक प्रवाह है;
यहाँ “कल” कालक्रम के रूप में मौजूद है।
पर जब अहं I3 से लौटकर मूल बिंदु (Origin) में स्थिर होता है,
तब मनोवैज्ञानिक “कल” समाप्त हो जाता है।
वहाँ केवल साक्षी और अद्वैत शेष रहते हैं।
यही सार है
यही समस्त अध्यात्म का सार है।
यही वेदान्त का निष्कर्ष है।
यही सभी ग्रंथों का हृदय है।
पर इस सत्य को केवल समझना पर्याप्त नहीं —
इसे जीने के लिए सजगता और निरंतर अभ्यास आवश्यक है।
इस सार को भूल जाना ही भीतर की बेवफ़ाई है।
अद्वैत से द्वैत में गिरना ही मूल विस्मरण है।
आपके भीतर जो भी आध्यात्मिक शब्द, सूत्र या अनुभव हैं,
उन्हें इसी मॉडल के साथ जोड़ दीजिए —
ताकि समझ बिखरी न रहे,
बल्कि एकीकृत होकर स्पष्टता में बदल जाए।
अध्याय 7 — वर्तमान, मुक्ति और अद्वैत का रहस्य
I0 ───── interaction ─────► P0
Past │ │
▼ ▼
I1 ◄──── change ────────► P1
Future │ │
▼ ▼
I2 ◄──── change ────────► P2
वर्तमान में होना ≠ क्षण में होना
वर्तमान में होना = अद्वैत सत्य में होना
वर्तमान सिर्फ़ आदिबिंदु को बोलते हैं — बोध बिंदु, ब्रह्म, शून्य। इसके ऊपर समय की धारा बहती रहती है, जिसमें केवल भूत और भविष्य होते हैं।
यह समझ दिमाग से निकलनी पड़ेगी — हम सोचते हैं कि मैं समय में हूँ; जो मेरे पीछे है वह अतीत है, और जो मेरे आगे है वह अज्ञात भविष्य। लेकिन वास्तविकता में समय की धारा में “वर्तमान” जैसा कुछ नहीं होता। वर्तमान वही है जो समय की धारा से निरपेक्ष हो।
OPTION 1: Stop P axis → असंभव
OPTION 2: Stop I axis → संभव
Duality = I + P
Time exists
I-axis stops
↓
Witnessing
↓
Present
↓
Non-duality
वर्तमान तभी अनुभव होता है जब प्रकृति की धारा बह रही हो और अहं की धारा रुक जाए। प्रकृति की धारा लगातार बहती रहती है, और जब आप रुक कर उसे देख रहे होते हैं, वही वर्तमान कहलाता है।
Being in the present का अर्थ है:
- I axis (अहं) के बाहर होना।
- यह “moment में होना” नहीं है।
- यह असत्य-भेद से परे, अद्वैत सत्य में होना है।
इसलिए जरूरी है कि अहं स्थिर हो जाए। जब अहं स्थिर होता है, वह शून्य में विलीन हो जाता है। यदि अहं है, तो या तो अतीत की स्मृतियाँ होती हैं या भविष्य की कल्पनाएँ; सत्य कभी नहीं होता। यदि सत्य होता, तो उसे अतीत और भविष्य से कोई संबंध नहीं रखना पड़ता।
हमारे संबंध भी अतीत और भविष्य से बनते हैं। अतीत हमें पहचान देता है, और भविष्य हमें अपेक्षाओं में बाँधता है। अतीत को सुनते ही प्रकृति स्वतः मन में आ जानी चाहिए। नियत साफ़ होना ही वर्तमान में होना है।
वर्तमान जैसा कुछ नहीं होता। आप जो देख रहे हैं, उसमें एक time lag होता है। जैसे तारे की रोशनी हमें उसके वास्तविक समय में नहीं दिखती, बल्कि वह कई साल पहले का प्रकाश होता है। आप कहते हैं “मैं हूँ”, लेकिन आप अपनी ही रिकॉर्डिंग देख रहे हैं। अहंकार का कोई वर्तमान नहीं होता; वह या तो अतीत देख रहा होता है या भविष्य की कल्पना। आपने जितनी देर में अपने को देखा, वह भी गुजर गया। इसलिए कहा जाता है कि जगत मिथ्या है।
Time is thought।
जिड़ कृष्णमूर्ति कहते थे — जहाँ विचार गया, वहाँ समय है। perception या experience में हमेशा एक time lag होता है। विचार केवल सोच नहीं, बल्कि मानसिक गतिविधि है, चाहे उसमें सोच हो या न हो।
वर्तमान केवल उसके लिए संभव है जो बैठ गया हो आदि बिंदु पर। अब उसे जो प्रतीत हो रहा है उससे कोई लेना देना नहीं है। वर्तमान में कौन है? जो अपनी पहचान के लिए समय पर आश्रित नहीं है। इसके अलावा मन, इंद्रिय और विचार से वर्तमान में जीना संभव नहीं है। वर्तमान में केवल वही है जो वहां बैठ गया है जहाँ वह प्रकृति पर आश्रित नहीं है — “कामना पूर्ति”, “नाम मिल जाएगा”, “हस्ती मिल जाएगी” से परे।
Living in the present
- जीवन केवल वर्तमान में ही हो सकता है।
- लेकिन हम जो जी रहे हैं, वह P (प्रकृति) में है — तो सब क्या है? — मुर्दे। साधो, ये मुर्दों का गाँव।
अध्याय 8 — सौंदर्य, प्रेम और सत्य
Ego Present → Judgement → Ugly/Beautiful
Ego Absent → Pure Seeing → Beauty
जहां अहं नहीं है, वही सौंदर्य है। प्रकृति का खेल चलता रहता है, नियमों के अनुसार।
बदसूरती केवल द्रष्टा में होती है। वही जो देख रहा है, अच्छा-बुरा तय करता है। सामाजिक दृष्टि से जो आकर्षण लगता है, उसे हम प्रेम कह देते हैं। उसी तरह अध्यात्म में सत्य के प्रति निष्ठा को प्रेम और केवल उसे सौंदर्य बोलते हैं। लेकिन सत्य पकड़ने से नहीं आता; जहां निरहंकारिता है, वही सत्य है।
सत्य वहीं मिलता है जहाँ अहंकार नहीं है। अलख पुरुष (जो देखा नहीं जा सकता) वही मिलता है जहाँ अहंकार नहीं है।
“अलख पुरुष की आरसी, साधू का ही देह।
लाख जो चाहे अलख को, इन्हीं में तू लाख लेह।” — कबीर साहब
सौंदर्य और साधुता वहाँ खोजिए। जहां आंखें जाएँ, वहाँ नहीं। यदि आंखों पर विश्वास कर रहे हैं, तो अभी भी प्रकृति के खेल में उलझे हैं। सुंदरता, प्रेम, निष्ठा — इन शब्दों का इस्तेमाल सोच-समझ कर कीजिए। यह केवल उच्चतम के लिए है।
जो कोई loyalty (निष्ठा) की मांग करे, उससे सावधान रहिए। थोड़ी भी बुद्धि रखने वाला व्यक्ति आपको सत्य और उच्चतम की ओर ले जाता है। श्लोकों के साथ संतों के भजन हमेशा रखें, तभी समाज समझ पाएगा कि प्रेम, साधना, पूजा का सही अर्थ क्या है।
अध्याय 9 — “Time is thought and thought is time” — Jiddu Krishnamurti
Nature (P) + Ego (I)
│ interaction
▼
Thought
│
▼
Time
“Time is thought and thought is time” — Jiddu Krishnamurti
कृष्णमूर्ति सीधे रक्षक के नाभि में सवाल डाल रहे हैं। वह कहते हैं कि जिस भी चीज़ को तुम सत्य मान रहे हो, वह तुम्हारे विचार से उठी है या नहीं। अगर हाँ, तो वह सत्य नहीं हो सकता।
उनकी चुनौती यही थी कि हम लोग धार्मिक बनकर बैठे हैं और किसी कॉन्सेप्ट या इमेज को सत्य मान बैठे हैं। कृष्णमूर्ति पूछ रहे हैं — जिसे तुम सच बोल रहे हो, वह विचार से आता है या नहीं। उन्होंने यह स्थापित किया कि सब चीज़ें विचार से आती हैं। और उसके बाद ही उन्होंने विचार पर तीर चलाना शुरू किया।
क्या विश्वास (faith) विचार का उत्पाद है? — अगर हाँ, तो विश्वासहीन व्यक्ति को दूर कर दो।
क्या प्रेम (love) विचार का उत्पाद है? — अगर हाँ, तो प्रेमरहित व्यक्ति को दूर कर दो।
क्या पवित्रता (sacredness) विचार का उत्पाद है? — तब सचमुच कुछ भी पवित्र नहीं है।
विचार केवल I (अहं) और P (प्रकृति) का आदान-प्रदान है। यही विचार है, और यही कर्म है। विचार और कर्म में केवल सूक्ष्मता का अंतर है।
बिना प्रकृतिक विषय के विचार नहीं हो सकता। अगर प्रकृति नहीं होगी, तो विचार नहीं होगा। कोई ऐसा विचार नहीं है जिसमें प्रकृति शामिल न हो। इसलिए हमेशा विचारक (अहं) और प्रकृति दोनों मौजूद होते हैं।
अध्याय 10 — “जिद्दू कृष्णमूर्ति के अनुसार -ज्यादा विश्लेषण करने से विश्लेषण की क्षमता कम क्यों हो जाती है ?”
यह तब होता है जब विश्लेषण इस जिद पर अड़ा हो कि उसे बदलना नहीं है। विश्लेषण, विश्लेषक की छाया के जैसा हो जाता है।
इसे ऐसे समझिए — आपने घोड़े को घूंघट से बांध दिया है। आप अहंकार हैं, घोड़ा आपकी बुद्धि है, और घूंघट आपकी मान्यता। आप अपने घोड़े को दौड़ाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन शर्त यह रख दी है कि घोड़ा घूंघट से आगे नहीं जा सकता।
तो घोड़ा क्या करेगा? वह वहीं घूम-फिरकर कूँड़-फंग करेगा। बुद्धि कैसे आगे बढ़ेगी, जब तक अहंकार अपनी मान्यताओं को हटाएगा नहीं?
अध्याय 11 — “सबदों से कालातीत कैसे जा सकते हैं? मैं तो सबदों में ही फंस गया न?”
Words → Remove Illusions
Silence → Reveals Reality
सबद कालातीत जाने के लिए नहीं हैं। वे केवल व्यर्थ के सबद काटने के लिए हैं। झाड़ू किस लिए होती है? सबद भी उसी तरह हैं। इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें केवल रट लिया जाए। सही आध्यात्मिक सबदों से अपने आप को साफ़ करना है। जो मान्यताएँ और मूर्खताएँ पकड़ी हुई हैं, उन्हें हटाओ। उसके बाद उनके पीछे कोई औचित्य नहीं बचता।
उपसंहार — समय मुझमें है
PURE AWARENESS (Non-dual Origin)
│
▼
Perceptual Division
│
┌──────────────┴──────────────┐
▼ ▼
I-Stream P-Stream
(Memory / Ego) (Nature / Rules)
│ │
└────── Interaction ─────────┘
│
Psychological Time
│
Conflict / Suffering
│
Direct Observation
│
Ego Quietens
│
Non-Dual Living
समय की पारंपरिक परिभाषाएँ अक्सर चक्रीय होती हैं;
पर अनुभव में समय परिवर्तन और संबंध की धारा है।
अहं और प्रकृति का आदान-प्रदान
जीवन को गति देता है —
और उसी गति का मनोवैज्ञानिक अनुभव समय है।
जब मन स्वयं को अलग सत्ता मानता है
तो संघर्ष और दूरी बढ़ती है।
जब वह प्रक्रिया का हिस्सा देखता है
तो मनोवैज्ञानिक दबाव घटता है।
वर्तमान कोई क्षण नहीं —
बल्कि ऐसी स्पष्टता है
जहाँ अनुभव बिना केंद्र के घटित होता है।
इसी स्पष्टता में
सौंदर्य, प्रेम और सत्य
स्वतः प्रकट होते हैं।
अहं कहता है —
मैं समय में हूँ।
पर सत्य है —
समय अहं में है।
जब अहं शांत होता है
तो काल मिटता है।
और जो शेष रहता है —
वही वर्तमान, वही मूल बिंदु, वही अद्वैत है।
- समय = विचार
- विचार = अहं-प्रकृति का आदान-प्रदान
- अहं = मनोवैज्ञानिक समय
- वर्तमान = अद्वैत साक्षीभाव
- सौंदर्य = अहं का अभाव
- सत्य = विचारक का अभाव
- अहं = अपूर्णता की अनुभूति
- अपूर्णता = चाह का जन्म
- चाह = दूरी की अनुभूति
- मनोवैज्ञानिक दूरी = काल का अनुभव
- संबंध = पारस्परिक परिवर्तन
- परिवर्तन का अनुभव = मनोवैज्ञानिक समय
- क्रिया (मनोवैज्ञानिक) = अहं की गति
- नियत = आंतरिक दिशा
- अनुभव = स्मृति का संचय
- स्मृति = विचार की सामग्री
- भविष्य = स्मृति की प्रक्षेपणा
- अतीत = स्मृति का भंडार
- अहंयुक्त वर्तमान = व्याख्यायित अनुभव
- साक्षी में वर्तमान = अद्वैत अनुभूति
- साक्षीभाव = चयनरहित जागरूकता
- मौन = विचार की शिथिलता
- निःअहं = मनोवैज्ञानिक निःकाल
- अद्वैत = मनोवैज्ञानिक दूरी का अंत
- सत्य (अद्वैत संदर्भ) = विचारक का लय
- सौंदर्य (आध्यात्मिक संदर्भ) = निरहंकार दृष्टि
- प्रेम = सत्य के प्रति निष्ठा
- मुक्ति = अहं की धारा का शांत होना
- प्रकृति = नियम आधारित प्रवाह
- जीवन = अहं-प्रकृति की अंतःक्रिया
- प्रतीत्यसमुत्पाद = परस्पर उद्भव
- जटिलता = मूल से दूरी का अनुभव
- सरलता = आदिबिंदु की निकटता
- शून्य = निर्विचार उपस्थिति
- आदिबिंदु = मनोवैज्ञानिक विभाजन से पूर्व अवस्था
- “नाहं कालस्य, अहमेव कालम्” = मनोवैज्ञानिक समय का केंद्र अहं है
| समय क्या है? | वर्तमान क्या है? |
|---|---|
| गति | आदिबिंदु |
| परिवर्तन | स्थिरता |
| दूरी | अद्वैत |
| अपूर्णता | पूर्णता |
| असंतोष | शांति |
| चाह | संतोष |
| नियति-प्रेरित क्रिया | स्वाभाविकता |
| कारण-परिणाम | साक्षीभाव |
| संबंध-बंधन | निरपेक्षता |
| परस्पर निर्भरता | एकत्व |
| अहं | निःअहं |
| यात्रा | उपस्थिति |
| रूपांतरण | अपरिवर्तन |
| जटिलता | सरलता |
| दूराव | अस्तित्व |
| माया | सत्य |
| साधना-प्रयास | सहजता |
| काल | निःकाल |
| बहाव | शून्य |