ऋभु गीता अध्याय 4, श्लोक 10-20 — अनात्मा जैसा कुछ भी नहीं है
ऋभु गीता — अध्याय 4, श्लोक 10-20 अवलोकन
वेदांत सहिता - 8 फ़रवरी 2026
4.10: निदाघ को संबोधित करते हुए ऋभु बोले—मैं अध्यात्म का वह निर्णायक निष्कर्ष कहूँगा, जो तीनों कालों में कहीं नहीं पाया जाता।
यह साधारण शिक्षा नहीं—
अंतिम प्रहार है, सीधी घोषणा है।
यह किसी व्यक्ति की राय नहीं,
शिवत्व की दृष्टि है—काल से परे।
ऋभु यहाँ शुरुआत में ही
शिष्य की पूरी जमीन हिला देते हैं।
जो अब तक जाना, सीखा, माना—
सबको प्रश्न के कटघरे में खड़ा कर देते हैं।
अध्यात्म को सजाने नहीं,
उसे तोड़ने और खाली करने की बात है।
शिष्य को चेतावनी है—
आगे जो आएगा वह मन को सहन नहीं होगा।
क्योंकि यह ज्ञान जोड़ता नहीं,
पहचानें छीन लेता है।
यहाँ से यात्रा शुरू नहीं होती—
यहीं से “तुम” खत्म होने लगते हो।
4.11: शिव द्वारा दिए गए गूढ़ उपदेश को मैं संक्षेप में कह रहा हूँ। प्रसंगजन्य आत्मभाव (मैं-भाव) अनात्मा है; मन और जगत भी अनात्मा हैं। निश्चयपूर्वक जान लो—अनात्मा जैसा कुछ भी नहीं है।
ये गुरु की व्यक्तिगत बात नहीं, शिवत्व की घोषणा है।
सत्य से उठी हुई वाणी है, अहंकार से नहीं।
जिसे तुम आत्मा कहते हो, वह भी अवधारणा है;
मन और जगत भी उसी तरह अनात्म हैं।
और अंततः—अनात्मा जैसा भी कुछ नहीं है।
आत्मा = “मैं”, अनात्म = “मुझसे अलग”।
पर जो अलग दिखता है, वह भी मेरे ही अनुभव में है।
मैं आत्म हूँ, दीवार अनात्म—तो दीवार किसके लिए है? — मेरे लिए।
जो भी अनात्म है, वह द्वैत के एक शिरे पर खड़ा है
और दूसरे शिरे पर हूँ “मैं”।
वस्तुओं को अनात्म कहने का मतलब यही है कि “मैं अहंकार हूँ”।
अहंकार ही अपने लिए अनात्म की दुनिया रचता है।
ऋभु गीता का सीधा निशाना अहंकार है।
लोकधर्म बुरे विषय हटाता है;
उच्च धर्म अच्छे विषय भी हटाता है;
ऋभु गीता—अहंकार की पूरी संरचना हटाती है।
लोकधर्म को पीड़ा होती है क्योंकि वह अच्छे-बुरे में जीता है।
ऋभु गीता कहती है—आत्मा-अनात्मा, द्वैत-अद्वैत, ब्रह्मा-विष्णु-शिव—सब अवधारणाएँ हैं।
पहले ही श्लोक में घोषणा—समस्या “तुम” हो; समस्या अहंकार है।
4.12: क्योंकि वहाँ कोई संकल्प नहीं, कोई आकार नहीं—केवल ब्रह्म ही है; इसलिए जान लो कि अनात्मा जैसा कुछ भी नहीं है।
अनात्म अहंकार का विषय है।
जब आत्म ही कल्पना है, तो अनात्म कैसे रहेगा?
संकल्प अहंकार के लिए हैं—इसलिए उनका मूल्य नहीं।
पवित्र-अपवित्र, ऊँचा-नीचा—सब झूठ हैं।
जो ब्रह्म है, वह बिना आकार और बिना धारणा है।
जहाँ पकड़ नहीं, वहीं सत्य का संकेत है।
4.13: जहाँ चित्त नहीं, वहाँ विचार और चिंता नहीं; जहाँ देहभाव नहीं, वहाँ जरा नहीं। केवल ब्रह्म ही है—अनात्मा जैसा कुछ भी नहीं।
चित्त, मन, चिंता, देहभाव, बुढ़ापा—सब अहंकार के विषय हैं।
इसीलिए असत्य हैं; इन्हीं का मिटना मुक्ति है।
जहाँ देखने वाला नहीं, वहाँ चिंता भी नहीं। अनात्मा झूठ है ।
4.14: जहाँ पैर का भाव नहीं, वहाँ गति नहीं; जहाँ हाथ का भाव नहीं, वहाँ क्रिया नहीं। केवल ब्रह्म ही है—अनात्मा जैसा कुछ भी नहीं।
गति और क्रिया भी अहंकार के संदर्भ हैं।
अहंकार के लिए कर्म है;
अहंकार से परे—सब क्रीड़ा है।
जो जा रहा है, जो कर रहा है—
सब अनुभव का खेल है, स्वतंत्र सत्य नहीं।
4.15: ब्रह्म के अभाव में जगत नहीं; जगत के अभाव में हरि भी नहीं। केवल ब्रह्म ही है—अनात्मा जैसा कुछ नहीं।
ब्रह्म कोई वस्तु नहीं—अहंकार की अनुपस्थिति है।
जिसे तुम जगत कहते हो—वह अनुभव की रचना है।
जगत मिथ्या है तो उसका रचयिता भी धारणा है।
ज्ञान का मिट जाना ही ब्रह्म की झलक है।
सपना चाहे पवित्र हो या अपवित्र—सपना ही है।
4.16: जहाँ बुढ़ापे (जरा) का भाव नहीं है, वहाँ मृत्यु नहीं है; यह सत्य लोक और वेद दोनों से परे है। केवल ब्रह्म ही है—अनात्मा जैसा कुछ नहीं।
बूढ़ापन, जन्म-मरण अहंकार की मान्यताएँ हैं।
कामनाओं की पूर्ति के लिए बनाए गए ढाँचे हैं।
वेद भी संकेत हैं—सत्य उनसे परे है।
विषय गंदे नहीं;
पर जब “मैं” नकली है, तो कर्म भी नकली हो जाते हैं।
4.17: धर्म नहीं है। शुचिता (पवित्रता) नहीं है। सत्य नहीं है। और भय भी नहीं है। क्योंकि केवल ब्रह्म मात्र ही है—अनात्मा जैसा कुछ नहीं।
धर्म, पवित्रता, सत्य, भय—अहंकार के लिए बने ढाँचे हैं।
जो तुम बनाते हो और निभाते हो—वह भूमिका है।
अहंकार अपने ही नियम बनाता है
और उन्हीं से बंध जाता है।
4.18: मेरे लिए न अक्षरों का सहारा है, न अक्षरों में जड़ता; केवल ब्रह्म ही है—अनात्मा जैसा कुछ नहीं।
शब्द संकेत हैं, सत्य नहीं।
श्रुति भी अगर विषय बन जाए—तो मिथ्या हो जाती है।
अक्षर बच्चे को बहलाते हैं;
पर सत्य अक्षरों से परे है।
4.19: तत्त्वतः न गुरु है, न शिष्य; केवल ब्रह्म ही है—अनात्मा जैसा कुछ नहीं।
गुरु-शिष्य संबंध भी भूमिका है।
अहंकार जिसे गुरु बनाए—वही नकली गुरु है।
द्वैत ही दुख है—
जीव और जड़ का विभाजन ही पीड़ा है।
4.20: एक के बिना दूसरा नहीं हो सकता; यदि कहीं सत्य हो तो असत्य भी होगा।
जिसका विपरीत है—वह मिथ्या है।
सत्य वही है जिसका कोई दूसरा नहीं।
अहंकार सत्य को भी वस्तु बना देता है,
और वही उसे मिथ्या कर देता है।
जब “मैं” मिटता है—
तभी अद्वैत की झलक आती है।
प्रश्न 1 — इतने कथन देने के बाद भी कहा जा रहा है कि सत्य अकथनीय है?
कथन संकेत हैं, सत्य नहीं।
शब्द दिशा दिखाते हैं, मंज़िल नहीं बनाते।
अहंकार सत्य को भी विषय बना लेता है,
इसलिए जितना कहा जाता है—उतना ही बाँधने का खतरा है।
बातों में पकड़ नहीं;
प्रेम और प्रत्यक्षता में सत्य की झलक है।
जो तीन साल से शब्द इकट्ठा कर रहे हैं—
उन्होंने शब्दों को वस्तु बना लिया है।
दो तरह के लोग होते हैं—
एक जो शब्द से रिश्ता रखते हैं,
दूसरे जो मर्म से रिश्ता रखते हैं।
यहाँ काम प्रेम और डूबने का है,
न कि केवल समझाने का।
प्रश्न 2 — बौद्धिक स्पष्टता के बाद भी अनुभव क्यों नहीं आता?
बौद्धिक समझ सतह पर है;
डूबना भीतर की प्रक्रिया है।
अहंकार व्यस्त रहता है ज्ञान के खेल में,
पर सत्य पीछे से प्रकट होता है।
जो हर चीज़ को शब्द मानते हैं,
वे शब्दों का कबाड़ भर लेते हैं।
ध्यान में जो होना था—वह हो चुका है;
अब समझाने की नहीं, समर्पण की बात है।
Intellectual clarity पर्याप्त नहीं;
डूबना आवश्यक है।
प्रश्न 3 — सत्य जानने के बाद भी दुख क्यों बना रहता है?
क्योंकि अनुभव पर विश्वास अधिक है,
और वाणी पर विश्वास कम।
तुम्हें दुख का अनुभव हो रहा है,
इसलिए वही तुम्हारा सत्य बन गया है।
परीक्षण तभी होता है
जब किसी वचन पर विश्वास हो।
अहंकार स्वयं को वस्तु नहीं बना सकता;
जैसे उँगली खुद को छू नहीं सकती।
हाथ वस्तु पकड़ता है;
अहंकार ही पकड़ने वाला है।
प्रश्न 4 — मनुष्य की हिंसा, सत्ता और पाखंड क्यों दिखते हैं?
अहंकार शक्ति मिलने पर
अपने छिपे रूप प्रकट करता है।
आम व्यक्ति अवसर न मिलने से शांत दिखता है;
सत्ता मिलने पर प्रवृत्ति खुल जाती है।
मनुष्य पशु से आया है—
पर अहंकार उसे पाखंडी बना देता है।
दूसरों पर उँगली उठाना आसान है;
अपने स्वार्थ को देखना कठिन।
व्यवस्था भी अहंकार के खेल से चलती है—
वोटर, ग्राहक, नेता—सब उसी जाल में हैं।
प्रश्न 5 — क्या प्रेम और हवस का भेद भी अहंकार से जुड़ा है?
अहंकार हवस को सही ठहराता है
और प्रेम से डरता है।
प्रेम में “मैं” पिघलता है;
हवस में “मैं” मजबूत होता है।
इसीलिए आम मनुष्य प्रेम से भागता है,
और इच्छा को ही जीवन मान लेता है।
श्लोक और अनुवाद
यह ग्रंथ मूलतः ऋषि ऋभु और निदाघ के संवाद के रूप में आता है —
जिसे ऋभु गीता के नाम से जाना जाता है।
ऋभु गीता कोई कथा नहीं सुनाती।
कोई पात्र नहीं खड़ा करती।
कोई भावनात्मक सहारा नहीं देती।
यह बस एक ही बात को बार-बार,
सैकड़ों बार,
हज़ार कोणों से कहती है —
और जब तक यह भ्रम टूट न जाए —
यह रुकती नहीं।
यहाँ इस ग्रंथ के साथ यदि आप आचार्य जी के साथ अंत तक रुक गए,
तो शुरुआत करने वाला बच नहीं सकता ।
यह अध्ययन नहीं,
यह विसर्जन है।
यह शास्त्र नहीं,
यह शस्त्र है।
अध्याय 4, श्लोक 10
निदाघमथ संबोध्य ततो ऋभुरुवाच ह।
अध्यात्मनिर्णयं वक्ष्ये नास्ति कालत्रयेष्वपि ॥10।।
अनुवाद:
निदाघ को संबोधित करते हुए ऋभु बोले—मैं अध्यात्म का वह निर्णायक निष्कर्ष कहूँगा, जो तीनों कालों में कहीं नहीं पाया जाता।
अध्याय 4, श्लोक 11
शिव-उपदिष्टम् संक्षिप्य गुह्यात् गुह्यतरं सदा ।
अनात्मेति प्रसङ्गात्मा अनात्मेति मनोऽपि वा ।
अनात्मेति जगद्वापि नास्त्यनात्मेति निश्चितु ॥11॥
अनुवाद:
शिव द्वारा दिए गए गूढ़ उपदेश को मैं संक्षेप में कह रहा हूँ। प्रसंगजन्य आत्मभाव (मैं भाव) अनात्मा है, मन भी अनात्मा है, और यह जगत भी अनात्मा ही है। निश्चयपूर्वक जान लो कि अनात्मा जैसा भी कुछ नहीं है।
अध्याय 4, श्लोक 12
सर्वसंकल्पशून्यत्वात् सर्वाकारविवर्जनात् ।
केवलं ब्रह्मभावत्वात् नास्त्यनात्मेति निश्चितु ॥12॥
अनुवाद:
क्योंकि वहाँ कोई संकल्प नहीं है, कोई आकार नहीं है, और केवल ब्रह्म ही है — इसलिए निश्चयपूर्वक जान लो कि अनात्मा जैसा कुछ भी नहीं है।
अध्याय 4, श्लोक 13
चित्तभावे चिन्तनीयो देहभावे जरा च न ।
केवलं ब्रह्मभावत्वात् नास्त्यनात्मेति निश्चितु ॥13।।
अनुवाद:
जहाँ चित्त का भाव ही नहीं, वहाँ विचार और चिंता नहीं। जहाँ देह का भाव ही नहीं, वहाँ जरा (बुढ़ापा) नहीं। क्योंकि केवल ब्रह्म ही है—निश्चयपूर्वक जान लो कि अनात्मा जैसा कुछ भी नहीं है।
अध्याय 4, श्लोक 14
पादभावाद्गतिनास्ति हस्तभावात् क्रिया च न ।
केवलं ब्रह्ममात्रत्वात् नास्त्यनात्मेति निश्चितु ॥14॥
अनुवाद:
जहाँ पैर का भाव नहीं, वहाँ गति नहीं। जहाँ हाथ का भाव नहीं, वहाँ क्रिया नहीं। क्योंकि केवल ब्रह्म मात्र ही है — निश्चयपूर्वक जान लो कि अनात्मा जैसा कुछ भी नहीं है।
अध्याय 4, श्लोक 15
ब्रह्माभावाज्जगन्नास्ति तदभावे हरिर्न च ।
केवलं ब्रह्ममात्रत्वात् नास्त्यनात्मेति निश्चितु ॥15॥
अनुवाद:
ब्रह्म के अभाव में जगत नहीं है, और जगत के अभाव में हरि (ईश्वर) भी नहीं है। केवल ब्रह्म मात्र ही है—निश्चयपूर्वक जान लो कि अनात्मा जैसा कुछ नहीं है।
अध्याय 4, श्लोक 16
मृत्युर्नास्ति जराभावे लोकवेददुराधिकम् ।
केवलं ब्रह्ममात्रत्वात् नास्त्यनात्मेति निश्चितु ॥16॥
अनुवाद:
जहाँ बुढ़ापे (जरा) का भाव नहीं है, वहाँ मृत्यु नहीं है। यह सत्य लोक और वेद — दोनों से भी परे है। क्योंकि केवल ब्रह्म मात्र ही है — निश्चयपूर्वक जान लो कि अनात्मा जैसा कुछ नहीं है।
अध्याय 4, श्लोक 17
धर्मो नास्ति शुचिर्नास्ति सत्यं नास्ति भयं न च ।
केवलं ब्रह्ममात्रत्वात् नास्त्यनात्मेति निश्चितु ॥17॥
अनुवाद:
धर्म नहीं है। शुचिता (पवित्रता) नहीं है। सत्य नहीं है। और भय भी नहीं है। क्योंकि केवल ब्रह्म मात्र ही है— निश्चयपूर्वक जान लो कि अनात्मा जैसा कुछ नहीं है।
अध्याय 4, श्लोक 18
अक्षरोच्चारणं नास्ति अक्षरत्यजडं मम ।
केवलं ब्रह्ममात्रत्वात् नास्त्यनात्मेति निश्चितु ॥18॥
अनुवाद:
मेरे लिए न अक्षरों का सहारा है, न अक्षरों को लेकर कोई जड़ता है। क्योंकि केवल ब्रह्म मात्र ही है— निश्चयपूर्वक जान लो कि अनात्मा जैसा कुछ नहीं है।
अध्याय 4, श्लोक 19
गुरुरित्यपि नास्त्येव शिष्यो नास्तीति तत्त्वतः ।
केवलं ब्रह्ममात्रत्वात् नास्त्यनात्मेति निश्चितु ॥19॥
अनुवाद:
तत्त्वतः गुरु भी नहीं है, और शिष्य भी नहीं है। क्योंकि केवल ब्रह्म मात्र ही है — कि अनात्मा जैसा कुछ नहीं है।
अध्याय 4, श्लोक 20
एकाभावान्न द्वितीयं न द्वितीयान्न चैकता ।
सत्यत्वमस्ति चेत् किञ्चित् असत्यत्वं च सम्भवेत् ॥20॥
अनुवाद:
एक के अभाव में दूसरा नहीं हो सकता, और दूसरे के अभाव में एक भी नहीं हो सकता। यदि कहीं भी कुछ सत्य हो, तो असत्य का होना भी सम्भव हो जाएगा।