श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6, श्लोक 46 — सबसे श्रेष्ठ योगी है
श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 6, श्लोक 46 अवलोकन
श्रीमद्भगवद्गीता सत्र | 18 जनवरी
योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ है और कर्म करने वालों से भी श्रेष्ठ है;
अतः हे अर्जुन! तुम योगी बनो।
योगी तपस्वियों, ज्ञानियों और कर्मियों से श्रेष्ठ है।
कर्मी अंधकार और अज्ञान में वस्तुओं के पीछे दौड़ता है।
जो चीज़ आकर्षक लगी, उसी के पीछे भाग पड़ा।
पूरी दुनिया जो कर रही है, वही वह भी करने लगता है।
ज्ञानी हर चीज़ को जानने की वस्तु बना लेता है।
कम से कम अब वह अपनी बात तो करने लगा।
“तुम जैसे हो, वैसे ही देखो”—इसे आत्मज्ञान कहा जाता है।
लेकिन यहाँ भी उसने विषय को वस्तु बना दिया।
अहम और अध्यात्म उसके लिए भी जानने की चीज़ें भर रह जाती हैं।
तपस्वी जो चीज़ चेतना को नीचे गिराती है, उसका त्याग करने लगता है।
उसे समझ आ जाता है कि वह मूर्ख है, इसलिए वह सारी ऊर्जा त्याग में लगा देता है।
अध्यात्म भीतर के झूठ को पूरी तरह त्यागने के लिए है,
लेकिन यहाँ एक जगह वह चूक जाता है—त्याग करने वाला बचा रह जाता है।
त्याग का कोई अंत नहीं है।
जीवन जियोगे तो हमेशा कुछ न कुछ त्यागने को होगा।
“मैं कर्मी हूँ।
मैं ज्ञानी हूँ।
मैं तपस्वी हूँ।”
इन सबमें “मैं” बचा रह गया।
मैं पाऊँगा।
मैं त्यागूँगा।
अंतर भले ही ज़मीन-आसमान का हो,
लेकिन “मैं” फिर भी मौजूद है।
सबसे श्रेष्ठ योगी है।
योग का अर्थ है—दो नहीं बल्कि एक है—यही देखना ही योग है। योग कोई नई चीज़ नहीं है; योग पहले से ही है।
संयोग केवल एक ही सत्य है।
यह बताओ कि तुम अलगाव कहाँ से ले आए?
सब कुछ संपूर्ण का ही भाग है।
मछलियों को तैरना सीखने की ज़रूरत नहीं होती।
पक्षियों को उड़ना सीखना नहीं पड़ता।
हर चीज़ जानती है कि उसे क्या करना है,
क्योंकि सब ब्रह्म का ही अंश है।
शरीर में जो कुछ हो रहा है, उसमें तुम्हारी ज़रूरत नहीं है—
इसलिए तुम प्राण नहीं हो।
तुम मानते हो कि तुम कर्ता हो, लेकिन—
सारी प्रक्रियाएँ तुम्हारे बिना भी चल रही हैं।
जहाँ तुम बीच में आते हो, वहाँ कहानी जुड़ जाती है।
योगी पूछता है—“मैं है क्या?”
वह उसी “मैं” के भीतर उतर जाता है।
जब दिखता है कि अहंकार मिथ्या है
और जो कुछ हो रहा है वह प्रकृति के अनुसार हो रहा है—
यही योग है।
अहंकार कोई वस्तु नहीं, मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है।
अहंकार बेहोशी में रहता है।
उसे न देखो तो वह है।
उसे देखो तो वह मिट जाता है।
देखना ही मिटना है।
रेत का महल बचाने में कितना तनाव होता है—
अहंकार भी वैसा ही एक झूठ है।
आनंद कोई अवस्था नहीं है।
जहाँ तुम नहीं हो, वही आनंद है।
वस्तुगत रूप से लहर समुद्र से अलग दिखाई दे सकती है,
लेकिन वह यह नहीं कहती—
“मैं अलग हूँ।”
“अगर मैं खुद को न चलाऊँ तो मेरा क्या होगा?”
“मुझे मिटना नहीं है।”
फ़िल्म, शोध, राजनीति, प्रेम—
सब कुछ “मैं” के बिना भी हो सकता है।
शुरुआत तो “मैं हूँ” से ही करनी पड़ेगी।
यह मत कहो कि तुम ब्रह्म हो या शून्य हो।
शुरुआत “मैं हूँ” से ही होती है।
शुरुआत अक्सर दुख से होती है।
लेकिन अगर तुम कहते हो—“मैं सूअर हूँ”,
तो उसे सिद्ध करो।
अहंकार सामाजिक मान्यताओं पर चलता है।
अगर तुम ऐसे समाज में पैदा होते जहाँ गधा पूजनीय होता,
तो क्या तब भी खुद को नीचा कहते?
तुम अपने बारे में जो भी कहते हो,
वह सब संयोग से मिला हुआ है, बाहर से आया हुआ है।
तुम कहाँ हो उसमें?
अगर गीता जैसी परीक्षाएँ न होतीं,
तो लोगों के भ्रम कभी टूटते ही नहीं।
जो परखने से डरता है,
उसका डर ही बता देता है कि वह झूठा है।
अहंकार का खेल देखो—
जिसे तुम सबसे ज़्यादा मूल्य देते हो,
उसी को सबसे कम परखते हो।
सच्चे को परखने में आनंद आता है।
जो टूट जाता है, वह कभी था ही नहीं।
अहंकार पीड़ा नहीं है; अहंकार मानसिक दुख है।
दर्द हो सकता है,
उसमें तुम्हारा होना ज़रूरी नहीं।
जब तुम बीच में आते हो,
तो मानसिक दुख शुरू हो जाता है।
अहंकार शारीरिक पीड़ा नहीं,
मानसिक दुख का नाम है।
अहंकार एक रेंज है ।
इसका मतलब यह है कि हर स्तर का अपना अहंकार होता है।
तो अगर अहंकार है भी, और तुम अध्यात्म के बारे में कुछ सीख रहे हो,
तो तुम अंधकार में जीने वाले कर्मी से तो बेहतर ही हो।
ये अवस्थाएँ बहती हुई हैं।
एक ही व्यक्ति कभी कर्मी होता है,
कभी ज्ञानी,
और कभी कुछ क्षणों के लिए योगी।
कर्मी होना गलत नहीं है,
लेकिन उसकी सीमा और समय तुम्हारे हाथ में है।
सत्तर साल का गलत जीवन।
अहंकार कहता है—
“नशे से दस साल कम हो जाएंगे।”
लेकिन यह नहीं पूछता की एसे सत्तर साल गंदगी में जी क्यों रहे हो ?
अक्सर घटिया ज़िंदगी व्यक्ति ने चुनी ही नहीं होती।
अगर जीवन आनंदमय हो,
तो कौन उससे भागना चाहेगा?
अपनी ज़िंदगी ठीक करो।
ऐसी बनाओ कि इन सब चीज़ों की ज़रूरत ही न पड़े।
“मैं” छुपा होता है मान्यताओं में।
“मैं” मिलेगा—
तुम्हारे डर में,
तुम्हारी पसंद में,
तुम्हारी मान्यताओं में।
पूछो—मुझे यह पसंद कैसे हो गई?
जब तुम्हारे पास सब कुछ उधार का है,
तो उनसे आत्मिक रिश्ता कैसे?
अगर किसी ने न बताया होता—
कि जूते का लिंग होता है,
कि पुरुष-स्त्री की भूमिकाएँ तय होती हैं,
कि पैसा इकट्ठा करना ज़रूरी है—
तो क्या तुम वही करते?
जो तुम सोच रहे हो,
जो चुनाव कर रहे हो—
वहीं अहंकार मिलेगा।
क्या भविष्य अतीत के बिना हो सकता है?
शायद यही प्रश्न मुक्ति है।
सत्यं सत्यं पुनः पुनः।
जैसे गिरे हो, वैसे ही उठो।
फिर गिरो, फिर उठो।
शरीर विकास की एक जटिल प्रक्रिया है।
जब तक शरीर है, अहंकार रहेगा।
मुक्ति कोई घटना नहीं है—
मुक्ति एक यात्रा है।
अहंकार कोई पदार्थ नहीं है,
यह शरीर के होने की एक त्रुटि है।
अगर अहंकार नहीं होगा, तो चुनाव कैसे होगा?
कर्म तो हो ही रहा है।
आँखें देखती हैं,
कान सुनते हैं,
दिमाग सोचता है—
क्या इन सबके लिए तुम्हारी ज़रूरत पड़ती है?
अहंकार बीच में आता है
तो काम बिगड़ जाता है।
विज्ञान बताता है कि
तुम्हारा निर्णय पहले ही अनुमानित किया जा सकता है।
शादी, पसंद, नींद—
सब हार्मोन, रसायन और वातावरण के अनुसार होते हैं।
अब भी सब कुछ संपूर्ण के अनुसार ही हो रहा है।
जैसे मछली को तैरना नहीं सीखना पड़ता,
वैसे ही तुम्हें भी कुछ करने की ज़रूरत नहीं।
ब्रह्मांड जानता है कि कैसे करना है।
तुम्हारा शरीर और बुद्धि तुम्हारे बिना भी चल रहे हैं।
छात्रों को केवल परामर्श नहीं, समझ की ज़रूरत है।
छात्रों को केवल राहत देना
असल समस्या को छुपा देता है।
दो व्यवस्थाएँ हैं—
एक कैम्पस के बाहर की,
एक कैम्पस के भीतर की।
छात्र इन दोनों व्यवस्थाओं के बीच पैदा होता है।
हमारे इतिहास के कारण पूरा हिंदुस्तान केवल शरीर से नहीं, मन से भी अवरुद्ध हो गया।
हम बहुत टूटे हुए लोग हैं।
डरे हुए माता-पिता, जिन्होंने अपने माता-पिता को भी डर में जीते देखा है।
बच्चा स्वभाव से नहीं डरता।
जब बच्चा निर्भय होता है, तब माँ-बाप डर जाते हैं और कहते हैं—
“डरना सीख, दबना सीख, सुरक्षित रहना सीख।”
यही डर पीढ़ी दर पीढ़ी चलता आया है।
और यही कारण है कि भारतीय माता-पिता
आईआईटी, नौकरी और पैसे को जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि मानने लगे।
यह कोई समझदारी का चुनाव नहीं है,
यह इतिहास से बनी हुई मानसिकता है।
उनके मन में स्मृति है—
असुरक्षा की,
भूख की,
गुलामी की,
अपमान की।
इसलिए उन्हें लगता है कि
अगर बच्चा सुरक्षित नौकरी में है,
अगर उसके पास पैसा है,
तो जीवन बच जाएगा।
उन्हें प्रेम या आनंद नहीं दिखता,
उन्हें केवल बचाव दिखता है।
और कैम्पस के अंदर भी सब बैसे ही लोग है, तो दोनों जगह सिर्फ दर देखने को मिलता है ।
डर के कारण रचनात्मकता मर जाती है।
डर और कला साथ नहीं चल सकते।
डर और नवाचार एक साथ नहीं रह सकते।
जो पढ़ाई में खेल ढूँढ लेता है,
वही नया रचता है।
लेकिन डर में पला बच्चा
सिर्फ़ सही जवाब ढूँढता है,
सच नहीं।
हम इतिहास को दिखाकर वर्तमान को सही नहीं ठहरा सकते।
इतिहास का अर्थ ही है—जो बीत चुका।
अगर हम आज भी उसी डर से निर्णय लेते हैं,
तो हम स्वतंत्र नहीं हैं।
जब अहंकार, डर और मान्यताएँ हटेंगी,
तभी प्रेम और ज्ञान का जन्म होगा।