श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6, श्लोक 43 — पुनः जन्म प्रतिपल है

श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 6, श्लोक 43
श्रीमद्भगवद्गीता सत्र | 27 दिसंबर 2025

हे कुरुनन्दन! वह व्यक्ति अपने नए जन्म में पूर्व देह से अर्जित वही बुद्धि-संयोग पुनः प्राप्त कर लेता है, और फिर वह अधिक तीव्रता के साथ पूर्ण सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है।

नए जन्म का अर्थ क्या है?
पूर्व जन्म में अर्जित बुद्धि-संयोग पुनः प्राप्त होता है।
→ कर्म से कर्ता बदलता है — शरीर, मन, अहंकार, बुद्धि— यही नया जन्म है ।
→ पुनः जन्म प्रतिपल है ।

कर्म का कर्ता कौन है?
अहंकार को लगता है अगर कर्म हो रहा है तो करने वाला भी तो कोई होना चाहिए ?
→ यदि सब प्रकृति में चल रहा है, तो सब करने वाली भी प्रकृति है। बाहरी चीज़ों को दोष मत दो।

दुख का मूल क्या है?
आशा ही परम दुख है।
→ इस जन्म का दुख नशे या बहाने से नहीं मिटेगा; इसे वर्तमान में देखो और सुधारो।

कैसे सुधार करें?
भीतर देखो। वही मुक्ति है। वही दर्शन है।
→ बाहर की दुनिया तभी सुधरेगी जब अंदर सुधार होगा।

क्या पुनः जन्म हर पल है?
हाँ।
→ हर पल का अनुभव नया जन्म है। जो अभी दुखी है, उसे अभी सुधारो।

प्रेम और उत्कर्षता का संबंध क्या है?
प्रेम कर्ता की आत्मप्रकर्षित स्थिति है।
→ जब कर्ता विकसित नहीं है, तब दूसरों से प्रेम असंभव है। उत्कर्षता कर्ता में होगी; तभी कर्म में प्रेम दिखाई देगा।

अंतिम निष्कर्ष
नए जन्म, कर्म, प्रेम, दुख, उत्कर्षता — सभी को साक्षी बनकर देखो।
→ अहंकार छोड़ो। बाहरी दोषों में मत फँसो। भीतर सुधारो, भीतर देखो। यही श्लोक का संदेश है।