श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6, श्लोक 44 — जिज्ञासा से शब्द-ब्रह्म के पार तक
श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 6, श्लोक 44 अवलोकन
श्रीमद्भगवद्गीता सत्र | 5 जनवरी
पूर्व अभ्यास के कारण ही वह व्यक्ति विवश होकर भी निश्चित रूप से उसी ओर खिंचा चला जाता है। योग के जिज्ञासु भी शब्द-ब्रह्म को पार कर जाते हैं।
जीवन अपनी गति से चलता है, पर जागरण विरक्ति से शुरू होता है
गीता या आत्मज्ञान के बिना भी लोगों की जिंदगी किसी न किसी तरह चलती रहती है। प्रकृति हर जीव को आगे बढ़ा ही देती है, और समाज भी अज्ञानियों को जगह देता रहता है। इसलिए जीवन की गाड़ी “रॉ-रॉ” करके भी चल जाती है। परंतु यह चलना केवल बाहरी स्तर पर है; भीतर की बेचैनी और प्रश्न वहीं बने रहते हैं।
अक्सर शुरुआत ऊब और विरक्ति से होती है। जब व्यक्ति संसार की दोहराव भरी चाल को देखता है, तब उसे भीतर से खालीपन महसूस होता है। यही ऊब धीरे-धीरे जिज्ञासा में बदलती है। यह प्रक्रिया वैसी है जैसे लंबी अवधि की कोई निवेश योजना—शुरू में छोटा-सा कदम, पर समय के साथ उसका मूल्य स्पष्ट होता जाता है। सत्य की दिशा में उठाया गया एक भी कदम व्यर्थ नहीं जाता; वह धीरे-धीरे व्यक्ति को भीतर की स्वतंत्रता की ओर ले जाता है।
यदि कोई सत्य को अभी जान सकता था लेकिन उसे टालता रहा, तो बाद में वही चीज बहुत देर से मिलती है और उसके साथ अनावश्यक पीड़ा जुड़ जाती है। इसलिए जागरण का आह्वान हमेशा वर्तमान में होता है।
जिज्ञासा, शब्द-ब्रह्म और सत्य का अनुभव
शास्त्र “शब्द-ब्रह्म” शब्द का उपयोग उस सत्य के लिए करते हैं जिसे केवल नाम या भाषा के स्तर पर समझा गया हो। परंतु वास्तविकता भाषा से भी परे है—जिसे नाम दिया गया है, उसे भी पार करना पड़ता है। ब्रह्म कोई कल्पना या धारणा नहीं है; इसलिए उसे पूरी तरह समझना शब्दों या सिद्धांतों से संभव नहीं होता।
मुक्ति को यहाँ नियति कहा गया है—अर्थात सत्य की ओर बढ़ने वाली चेतना अंततः उसी दिशा में खिंचती है। गीता का संकेत है कि पूर्व अभ्यास और गहरी जिज्ञासा व्यक्ति को सत्य की ओर खींचते रहते हैं, चाहे वह बीच-बीच में भटक भी जाए। जिज्ञासा अक्सर दुख और असंतोष से जन्म लेती है; यही असंतोष व्यक्ति को सतही उत्तरों से आगे जाने के लिए प्रेरित करता है।
व्यवहार और परमार्थ: दो स्तरों की समझ
व्यवहारिक जीवन में बहुत कुछ कल्पना और मान्यताओं पर आधारित होता है—समाज के नियम, भूमिकाएँ और पहचानें। परंतु परमार्थ के स्तर पर केवल सत्य का महत्व है। इसलिए बाहरी दुनिया में जो सामान्य या “नॉर्मल” माना जाता है, वही सत्य नहीं होता।
कई लोग कम उम्र में ही जिज्ञासु बन जाते हैं क्योंकि उनमें प्रश्न करने की ऊर्जा होती है। वहीं अधिक उम्र में व्यक्ति कई बार आदतों और मान्यताओं को ही सत्य मान लेता है। यह अंतर उम्र से अधिक दृष्टि और खुलेपन का होता है।
अहंकार, संसार और झूठे समन्वय
अक्सर समाज यह भ्रम देता है कि आध्यात्मिकता और अंधी सांसारिकता साथ-साथ चल सकती हैं। “राम और काम साथ-साथ” का विचार इसी भ्रम का उदाहरण है—जहाँ बाहरी छवियों और भूमिकाओं को आध्यात्मिकता का नाम दे दिया जाता है। पुरुष को परमात्मा, महिला को देवी और बच्चों को बाल-गोपाल कह देने से वास्तविक परिवर्तन नहीं आता; यह केवल सांस्कृतिक सजावट बन जाती है।
अहंकार ही व्यक्तिगत और सामूहिक स्तर पर कर्म करता है—चाहे व्यक्ति हो या राष्ट्र। इसलिए संघर्ष और टकराव भी उसी अहंकार से जन्म लेते हैं। जब व्यक्ति यह देखता है कि दुनिया में शक्ति ही अक्सर नियम बनाती है और कमजोर को दबाया जाता है, तब उसमें संसार के प्रति खिन्नता और विरक्ति पैदा होती है। यही विरक्ति कई बार उसे सत्य की खोज की ओर मोड़ देती है।
दुख, जिज्ञासा और जीवित संवेदनशीलता
सबसे “मुर्दा” वह व्यक्ति कहा गया है जो पूरी तरह जड़ और संतुष्ट हो चुका है—जिसमें कोई प्रश्न या पीड़ा नहीं बची। दर्द और जिज्ञासा साथ-साथ चलते हैं; वही व्यक्ति को जीवित और संवेदनशील बनाए रखते हैं। सत्य की खोज में दो केंद्र दिखते हैं—एक शक्ति और अहंकार का केंद्र, और दूसरा सत्य और जागरूकता का केंद्र। जागरण का अर्थ है कि व्यक्ति धीरे-धीरे दूसरे केंद्र की ओर खिंचने लगे।
सत्य को जानने का अनुभव इतना गहरा हो सकता है कि व्यक्ति को अपनी ही पुरानी दुनिया पराई लगने लगे। तब वह दूसरों का “परमात्मा” बनने की कोशिश नहीं करता, बल्कि स्वयं ईमानदार और जागरूक रहने पर ध्यान देता है।
श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 6, श्लोक 44) का संदर्भ
गीता का श्लोक बताता है कि पूर्व अभ्यास और जिज्ञासा व्यक्ति को सत्य की ओर खींचते रहते हैं। योग का जिज्ञासु केवल शब्दों या सिद्धांतों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उन्हें पार करने की क्षमता विकसित करता है। यह संकेत देता है कि आध्यात्मिक यात्रा कोई अचानक चमत्कार नहीं, बल्कि धीरे-धीरे पकने वाली प्रक्रिया है—जिसमें हर सच्चा प्रयास महत्वपूर्ण है।
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ।।४४।।
काव्य:
सच तो दिख ही गया
अब कैसे इंकार करे
जिज्ञासा ही गहरी हो
शब्दब्रह्म को पार करे
अन्वय:
पूर्वाभ्यासेन (पूर्व + अभ्यासेन) = पूर्व अभ्यास के कारण; एव = ही; सः = वह व्यक्ति; अवशोऽपि (अवशः + अपि) = विवश होकर भी; हि = निश्चित रूप से; तेन = उसी (ओर); ह्रियते = खिंचा चला जाता है; योगस्य (योग + स्य) = योग के; जिज्ञासुः अपि = जिज्ञासु भी; शब्दब्रह्म = शब्द-ब्रह्म को; अतिवर्तते (अति + वर्तते) = पार कर जाते हैं
अनुवाद:
पूर्व अभ्यास के कारण ही वह व्यक्ति विवश होकर भी निश्चित रूप से उसी ओर खिंचा चला जाता है। योग के जिज्ञासु भी शब्द-ब्रह्म को पार कर जाते हैं।
समापन
जीवन बाहरी स्तर पर बिना आत्मज्ञान के भी चलता रहता है, पर भीतर की बेचैनी व्यक्ति को अंततः प्रश्नों की ओर ले जाती है। दुख और विरक्ति से जन्मी जिज्ञासा ही सत्य की ओर पहला कदम बनती है। जब यह जिज्ञासा गहरी होती है, तब व्यक्ति शब्दों और मान्यताओं से आगे बढ़कर वास्तविक अनुभव की तलाश करता है। यही यात्रा धीरे-धीरे उसे भीतर की स्वतंत्रता और स्पष्टता तक ले जाती है।