श्रीमद्भगवद्गीता 6.44 — जिज्ञासा से शब्द-ब्रह्म के पार तक
श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 6, श्लोक 44 अवलोकन
श्रीमद्भगवद्गीता सत्र | 5 जनवरी
पूर्व अभ्यास के कारण ही वह व्यक्ति विवश होकर भी निश्चित रूप से उसी ओर खिंचा चला जाता है। योग के जिज्ञासु भी शब्द-ब्रह्म को पार कर जाते हैं।
काव्य:
सच तो दिख ही गया
अब कैसे इंकार करे
जिज्ञासा ही गहरी हो
शब्दब्रह्म को पार करे
पूर्वाभ्यास क्यों महत्वपूर्ण है?
पूर्व अभ्यास व्यक्ति को विवश कर देता है कि वह सत्य की ओर खिंचे। योग के जिज्ञासु शब्द-ब्रह्म को पार कर जाते हैं। अभ्यास ही दिशा देता है, वरना जिज्ञासा भी बिखर जाती है।
क्या ज्ञान के बिना जीवन चलता है?
जीवन बिना ज्ञान के भी चलता है क्योंकि प्रकृति अपने नियम से जीव को चलाती है। समाज अज्ञानियों के लिए जगह बनाता है; जीवन की गाड़ी रॉ-रॉ करती रहती है। लेकिन यह व्यावहारिक, सतही जीवन है—सत्य तक नहीं पहुँचता।
पहला कदम क्यों विरक्ति से शुरू होता है?
सत्य की ओर पहला कदम ऊब और विरक्ति से शुरू होता है। अभ्यास समय के साथ बढ़ता है और मुक्ति की संभावना बनती है। अगर अभी मिलने वाली चीज़ 30 साल बाद मिले, तो दुख और पछतावा ही मिलेगा। शब्द-ब्रह्म वह है जो नाम और समझ से परे है; ब्रह्म और मुक्ति सीधे अनुभव में हैं।
क्या अहंकार व्यक्तिगत मुक्ति रोकता है?
अहंकार यह सोचता है कि यह जन्म उसे मुक्ति देगा, लेकिन यह केवल संभावना है। लोकधर्म और सांसारिकता भ्रम पैदा करते हैं। घर, परिवार, या आँगन की सीमाएँ सत्य जानने में बाधा नहीं डालती।
दर्द और जिज्ञासा का क्या संबंध है?
जो settled हैं, वे “मुर्दा” हैं। सत्य और जिज्ञासा साथ चलती हैं। केंद्र और नियत साफ़ होना चाहिए। ज्ञान और ललकार साथ हों, पर किसी का गुलाम न बनो। मुक्त न होने वाला गुलाम है; मुक्त न होने पर अस्तित्व भी अधूरा है।
व्यवहारिक जीवन और परमार्थ में अंतर क्या है?
व्यवहारिक जीवन में सब बेकल्पित है, परमार्थ में मुक्ति निश्चय है। जिनकी जिज्ञासा कम है, उन्हें तारों और जीवन के अनुभव छोटे लगते हैं। जो वास्तविक ज्ञान चाहते हैं, उन्हें अपनी दिनचर्या बार-बार तोड़नी पड़ती है और अंधकार का सामना करना पड़ता है।
सत्य और ब्रह्म कैसे पहचाने?
शिव और सत्य की बात केवल निकार में होती है। बाहरी अनुभव, वस्तुएँ और प्रतीतिमात्र की चीज़ें भ्रम हैं। खोया हुआ व्यक्ति सबसे सुंदर है। अभ्यास और जिज्ञासा से ही शब्द-ब्रह्म को पार किया जा सकता है।
निष्कर्ष
पूर्वाभ्यास और निरंतर जिज्ञासा ही व्यक्ति को सत्य और मुक्ति की ओर खींचते हैं। अहंकार और बाहरी भ्रम जितना भी प्रबल हों, अभ्यास के माध्यम से शब्द-ब्रह्म को पार करना संभव है।
श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 6, श्लोक 44
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ।।४४।।
काव्य:
सच तो दिख ही गया अब कैसे इंकार करे जिज्ञासा ही गहरी हो शब्दब्रह्म को पार करे
अन्वय:
पूर्वाभ्यासेन (पूर्व + अभ्यासेन) = पूर्व अभ्यास के कारण; एव = ही; सः = वह व्यक्ति; अवशोऽपि (अवशः + अपि) = विवश होकर भी; हि = निश्चित रूप से; तेन = उसी (ओर); ह्रियते = खिंचा चला जाता है; योगस्य (योग + स्य) = योग के; जिज्ञासुः अपि = जिज्ञासु भी; शब्दब्रह्म = शब्द-ब्रह्म को; अतिवर्तते (अति + वर्तते) = पार कर जाते हैं
अनुवाद:
पूर्व अभ्यास के कारण ही वह व्यक्ति विवश होकर भी निश्चित रूप से उसी ओर खिंचा चला जाता है। योग के जिज्ञासु भी शब्द-ब्रह्म को पार कर जाते हैं।