श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6, श्लोक 47 — जो केवल कृष्ण को ही भजते हैं, वही सर्वश्रेष्ठ योगी हैं

श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 6, श्लोक 47

श्रीमद्भगवद्गीता – अध्याय 6, श्लोक 47 (25 जनवरी)

सभी योगियों में भी, जो श्रद्धावान योगी अपने ‘मैं’ को मुझमें स्थित करते हुए मुझे ही भजते हैं—वही मेरे मत में सर्वश्रेष्ठ योगी हैं।

काव्य:
प्रेम एक पर आ गया, और कुछ दिखता नहीं
न कल जिसे न अन्य है, श्रेष्ठ अचल योगी वही

लोग गीता समर्पण के लिए नहीं पढ़ते

लोग गीता शांति और मुक्ति पाने के लिए पढ़ते हैं। यह एक निचला तल है।

“लेकिन मुक्ति तो सर्वश्रेष्ठ है न?”
— मुक्ति भी एक कामना है। और “चाहना” ही बंधन है।

जब तक यह सवाल रहेगा कि “गीता से क्या मिला?”,
तब तक तुम अपने अहंकार के विस्तार के लिए आ रहे हो।
जब कोई है ही नहीं, तो उसे क्या मिलेगा?

गीता के पास कुछ पाने नहीं, मिटने आते हैं।

तुम कहते हो—यह पाना है, वह पाना है।
यह सब कामनाएँ हैं।

असल में गीता में सिर्फ़ यह मिटता है—
डर, कमाना, मूर्खता, कल्पनाएँ, आशाएँ, अज्ञान, अंधकार।

और जो शेष बचता है—
वही है आत्मा, आनंद, धर्म।

गीता पढ़ने के चार तल

सबसे नीचे:
“बताओ, गीता का उपयोग करके पैसे कैसे कमाएँ?”
— यह केवल भोग का तल है।

उससे थोड़ा ऊपर:
“गीता स्वर्ग जाने के लिए है।”
— यह भी निचला है, पर यहाँ कम से कम लोग मरने के बाद भोग की प्रतीक्षा करते हैं।

उससे ऊपर:
“गीता पढ़ रहे हैं, तो यह फ़ायदा हो रहा है।”
— अधिकतर समुदाय इसी तल पर है, जहाँ लोग अपने व्यावहारिक लाभ बताते हैं।

सबसे ऊपर:
“कृष्ण चाहिए, क्योंकि कृष्ण चाहिए—चाहे अशांति मिले।”

प्रेम करके ही उच्चतम मिलता है।
प्रेम तो उच्चतम से ही किया जाता है।

श्रद्धा गणना करने वालों के लिए नहीं है।

जो केवल कृष्ण को ही भजते हैं, वही सर्वश्रेष्ठ योगी हैं।

शुरुआत में हम मुक्ति और शांति के लिए आए थे—वह एक मीठा झूठ था।
तब जीवन में दस विषय थे, और गीता को ग्यारहवाँ विषय बना लिया।

लेकिन गीता तो मिटाने के लिए है।
जो मूर्खता के दस विषय थे, वे अब नहीं होने चाहिए।

सिर्फ़ गीता बचनी चाहिए—
अर्थात सत्य, आनंद, धर्म, संघर्ष।

राम और काम साथ-साथ नहीं चलते।
गीता (आत्मज्ञान, श्रेष्ठता, उत्तमता) के लिए
काम, माया और मुखता छोड़नी पड़ती है,
और कृष्ण पर पूर्ण समर्पण करना पड़ता है।

“कृष्ण भी चाहिए और कृष्णत्व का परिणाम भी चाहिए”—
यह द्वैत है।

सत्य के साथ चलो, तो सत्य मिलता है।
प्रेम के साथ चलो, तो प्रेम।

“प्रेम गली अति साँकरी, तामें दो न समाही।”

जो पूर्ण श्रद्धा से कृष्ण को समर्पित हो जाता है,
जिसे प्रेम के अतिरिक्त कुछ दिखाई नहीं देता—
वही सर्वश्रेष्ठ योगी है।

प्रेम कैसे आएगा?

प्रेमियों के गीत पढ़ो।
उनके साथ उठो-बैठो,
तो अपने भीतर भी पंख खुलने लगते हैं।

डर के साथ प्रेम नहीं चलता।
जब तक डर रहेगा, प्रेम नहीं सीख पाओगे।

कबीर ने प्रेम के साथ मधुरता नहीं जोड़ी—
उन्होंने तलवार की गूँज जोड़ी है।

प्रेम योद्धाओं का काम है।
कायर या कमज़ोर व्यक्ति प्रेम नहीं कर सकता।

लोक-संस्कृति में हमने प्रेम को
कमज़ोर, कोमल और गिरी हुई चीज़ बना दिया है।

तुम किसी को भी बैठा लेते हो,
किसी से भी बात कर लेते हो,
सबको “जी-जी” कहते हो—
ऐसे प्रेम नहीं सीखा जाता।

प्रेम सीखना है तो
ज़्यादातर प्रेमियों के साथ बैठो,
महापुरुषों के साथ बैठो।

यह मोहल्ले की चर्चा नहीं है

आचार्य जी सर्वश्रेष्ठ बोध दे रहे हैं,
लेकिन इतने समय बाद भी समुदाय के लोग
बोध-ढाँचे का उपयोग करके प्रश्न नहीं कर रहे।

आचार्य जी अपना सब कुछ दे रहे हैं।
ऐसे लोगों से क्यों बात करें
जो अधूरे मन से आते हैं?

बहुत समय ऐसे लोगों पर नष्ट किया गया
जो गैर-ज़िम्मेदार और कृतघ्न थे।

यह कोई दुकान नहीं है
कि पैसा दिया और घर चले गए।

गुरु के साथ तो एक हुआ जाता है।
ऐसे लोग नहीं चाहिए
जो केवल सौदा करने आते हों।

प्रश्न पूछने हों तो
बोध-ढाँचे का उपयोग करो—
अहंकार, अज्ञान, कमाना, माया जैसे शब्दों का प्रयोग करो।

अपने को केंद्र में रखकर मत पूछो।
ऊँचे केंद्र से प्रश्न करो।
यह मोहल्ले की चर्चा नहीं है।

आत्म-आवलोकन

मैंने कभी इस तरह नहीं सोचा था
कि गीता मिटने के लिए है,
और सबसे बड़ा योगी वही है
जिसे प्रेम के अतिरिक्त कुछ दिखाई नहीं देता।

“कृष्ण चाहिए क्योंकि कृष्ण चाहिए—चाहे अशांति मिले।”

अक्सर मैं शांति और आनंद के बारे में सोचता हूँ।
मुझे लगता है कि बिना आनंद का जीवन
दुःख के अतिरिक्त कुछ नहीं।

लेकिन दुःख और आनंद—
दोनों की छवियाँ किसके पास हैं?
अहंकार के पास।

और अहंकार के पास
सिर्फ़ निम्न और शूद्र कामनाएँ होती हैं।

इसीलिए दुःख और आनंद—
दोनों ही बंधन हैं।

सत्य के पास सत्य के लिए जाया जाता है।
कुछ पाने के लिए नहीं—
मिटने के लिए।

“कृष्ण चाहिए क्योंकि कृष्ण चाहिए—चाहे अशांति मिले।”
इसे श्रद्धा कहते हैं।
इसे सर्वश्रेष्ठ योग कहते हैं।

काव्य:
प्रेम एक पर आ गया, और कुछ दिखता नहीं
न कल जिसे, न अन्य है—श्रेष्ठ, अचल योगी वही