शून्यता सप्तति
छंद 1
बुद्ध ने स्थिति, उत्पत्ति, विनाश, सत्, असत्, हीन, मध्यम, उत्कृष्ट आदि का उल्लेख लोक व्यवहार का अनुसरण करते हुए किया है, न कि इसलिए कि ये तत्वतः हैं।
छंद 2
भाषा का महत्व नहीं है क्योंकि आत्मा, अनात्मा, आत्मा-अनात्मा का अस्तित्व नहीं है। जिनके बारे में भाषा का प्रयोग होता है वे निर्वाण की तरह निःस्वभाव हैं।
छंद 3
सभी वस्तुएँ हर प्रकार से स्वभाव-रहित हैं। वे कारण अथवा प्रत्यय, समग्रता या अलगाव में नहीं रहती। अतः वे शून्य हैं।
छंद 4
सत् की उत्पत्ति नहीं हो सकती क्योंकि सत् को पहले से रहना होगा। असत् उत्पन्न नहीं हो सकता क्योंकि वह अस्तित्वहीन है। सत्-असत् की उत्पत्ति उनमें विरोध के कारण संभव नहीं हैं। अतः उनकी स्थिति और विनाश संभव नहीं हैं।
छंद 5
जिसकी पहले से उत्पत्ति हो चुकी है उसकी उत्पत्ति नहीं होगी। जिसकी उत्पत्ति अभी होनी है वह उत्पन्न नहीं हो सकता। जिसकी उत्पत्ति वर्तमान में हो रही है वह अंशतः अनुत्पन्न होने के कारण उत्पन्न नहीं हो सकता।
छंद 6
कारण के लिए कार्य का होना आवश्यक है। भूतकाल में जिस कार्य की उत्पत्ति हो चुकी है और जो कार्य अभी तक उत्पन्न नहीं हुआ है, उन दोनों अवस्थाओं में कारण नहीं रहेगा क्योंकि उन कार्यों का अस्तित्व नहीं। उत्पन्न होता हुआ कार्य अस्तित्ववान् और अस्तित्व रहित होने के कारण विरोध ग्रस्त हो जाएगा। अतः तीनों कालों में कारण का अस्तित्व उत्पन्न नहीं हो सकता।
छंद 7
एक’ के बिना ‘अनेक’ संभव नहीं है। ‘अनेक’ के बिना ‘एक’ संभव नहीं है। अतः प्रत्ययों पर निर्भर होकर उत्पन्न होने वाली वस्तुओं के निर्धारण करने का कोई आधार नहीं बनता।
छंद 8
बारह निदानों पर निर्भर होकर उत्पन्न होने वाला दुख वास्तव में उत्पन्न नहीं हो सकता क्योंकि उस दुख का आश्रय किस चित्त में है इस बात का निर्धारण नहीं किया जा सकता।
छंद 9
शाश्वत, अशाश्वत कुछ भी नहीं है, आत्मा, अनात्मा नहीं है, कुछ भी शुचि नहीं है, कुछ भी अशुचि नहीं है, सुख नहीं है, दुःख नहीं है। अतः विपर्यास संभव नहीं है।
छंद 10
इनका अभाव होने के कारण विपर्यास से उत्पन्न अविद्या संभव नहीं है। चूंकि अविद्या नहीं है अतः संस्कार उत्पन्न नहीं होंगे। इसी तरह शेष अङ्गों की कथा है।
छंद 11
संस्कारों के बिना अविद्या नहीं हो सकती। इसी तरह अविद्या के बिना संस्कार नहीं उत्पन्न हो सकते। ये परस्पर निर्भर होने के कारण स्वभाव-रहित हैं।
छंद 12
स्वभाव से जो वस्तु निर्धारित नहीं है वह दूसरों को कैसे उत्पन्न कर सकती है? अतः दूसरों द्वारा निर्धारित सापेक्षता वाली वस्तु दूसरों को उत्पन्न नहीं कर सकती।
छंद 13
पुत्र के बिना पिता और पिता के बिना पुत्र संभव नहीं है। परस्पर निर्भरता के बिना इन दोनों में से किसी का अस्तित्व संभव नहीं है। वे दोनों एक साथ भी नहीं उत्पन्न हो सकते। इसी तरह बारह निदान भी है।
छंद 14
जिस प्रकार स्वप्न में सुख और दुख जिस वस्तु पर आधारित होते हैं, वह वस्तु वास्तविक नहीं होती; उसी प्रकार निर्भरता से उत्पन्न होने वाली वस्तु और निर्भरता में उत्पन्न करने वाली वस्तु का कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं होता।
छंद 15
(पूर्व पक्षी कहता है कि) यदि वस्तुएँ स्वभाव-रहित होती हैं, तो नीच, मध्यम और उच्च, तथा संख्या-युक्त जगत का कोई अस्तित्व नहीं है, और न किसी कारण से इनका अस्तित्व सिद्ध किया जा सकता है।
छंद 16
(माध्यमिक का कथन है कि) यदि स्वभाव की सिद्धि हो जाए तब निर्भर रहकर उत्पन्न होने वाली वस्तुएं ही उत्पन्न नहीं होगी। यदि निर्भर रहकर उनका अस्तित्व नहीं हो तब उनमें स्वभाव क्यों नहीं? क्योंकि स्व अस्तित्व-रहित नहीं हो सकता।
छंद 17
अस्तित्व रहित वस्तु में स्वभाव कैसे संभव है? कैसे उसमें परभाव या अभाव के कारण स्वभाव पैदा होगा? इसलिए स्वभाव, परभाव, अभाव विपर्यास हैं।
छंद 18
पूर्व पक्षी का कहना है कि: यदि वस्तु शून्य है तब उसकी उत्पत्ति और विनाश संभव नहीं है। जो स्वभाव से ही शून्य है वह कैसे उत्पन्न या विनष्ट हो सकता है ?
छंद 19
माध्यमिक का कथन है कि: भाव और अभाव एक साथ नहीं रह सकते। अभाव के न होने पर भाव संभव नहीं है। भाव और अभाव सदा विद्यमान हैं। अतः अभाव पर निर्भरता के बिना भाव संभव नहीं है।
छंद 20
यदि भाव का अस्तित्व न हो, तो अभाव भी संभव नहीं है, क्योंकि अभाव न तो स्वयं से उत्पन्न हो सकता है और न ही किसी अन्य कारण से। इस प्रकार, न तो भाव का अस्तित्व है और न ही अभाव का।
छंद 21
यदि भाव होता है तो केवल स्थायित्व होता; यदि अभाव होता है तो केवल अनुपस्थिति ही होती। ये दोनों दोष भाव के कारण ही जन्म लेते हैं। इसलिए, भाव को स्वीकार करना उचित नहीं है।
छंद 22
पूर्व पक्षी का कथन है कि: भाव है, परन्तु भाव का अस्तित्व अविच्छिन्न नहीं है, क्योंकि हर भाव अपने परिणाम को उत्पन्न करने के बाद समाप्त हो जाता है।
माध्यमिक का उत्तर है कि: भाव की यह अविच्छिन्न श्रृंखला असिद्ध है; इसके अतिरिक्त, ऐसी कोई भी कल्पित श्रृंखला अटूट नहीं रह सकती, और स्वतंत्र रूप से स्थिर नहीं रह सकती। इसीलिए, भाव नहीं है।
छंद 23
पूर्वपक्षी: नहीं! बुद्ध द्वारा दिए गए मार्ग का उपदेश उपस्थिति और अनुपस्थिति पर है, शून्यता पर नहीं।
उत्तर: उपस्थिति और अनुपस्थिति को शून्यता से अलग मानना ही भ्रम है।
छंद 24
पूर्वपक्षी : यदि उपस्थिति और अनुपस्थिति नहीं होते, तो फिर निर्वाण किसकी अनुपस्थिति से उत्पन्न होगा?
माध्यमिक : क्या निर्वाण यही समझ नहीं है, कि स्वभाव से कुछ भी न उपस्थित होता है और न अनुपस्थित रहता है?
छंद 25
यदि निर्वाण अनुपस्थिति से उत्पन्न होगा, तो वह पूर्ण समाप्ति का स्वरूप होगा। यदि इसके विपरीत होगा, तो वह शाश्वत का स्वरूप होगा। इसलिए, निर्वाण को भाव या अभाव के रूप में मानना उचित नहीं है।
छंद 26
यदि निर्वाण वास्तव में अनुपस्थिति का स्वरूप होगा, तो वह न भाव में स्थित होगा, न अभाव में। और जो न भाव में है, न अभाव में—वह तो केवल बोध ही हो सकता है।
छंद 27
जो किसी अन्य के द्वारा सिद्ध कहा जाता है, वह न तो उससे सिद्ध है और न स्वयं से।
दोनों एक-दूसरे को सिद्ध भी नहीं कर सकते,
क्योंकि जो स्वयं सिद्ध नहीं है, वह असिद्ध को सिद्ध नहीं कर सकता।
छंद 28
इस प्रकार कारण और परिणाम, भोग और अनुभोक्ता, दृश्य और दृष्टा — सबकी व्याख्या अंततः एक ही तरह की है। वे सब शून्य ही हैं।
छंद 29
तीनों कालों का अस्तित्व नहीं है क्योंकि वे अस्थिर, परस्पर-निर्भर और परिवर्तनशील हैं। वे न तो स्वतःस्थित हैं, और स्वभाव-रहित होने के कारण मात्र कल्पना-रूप हैं।
छंद 30
चूँकि निर्मित वस्तुओं के तीन लक्षण—उत्पत्ति, स्थिति और विनाश—का अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है, इसलिए न तो कुछ सशर्त है और न ही कुछ निःशर्त; वस्तुतः किसी भी तत्त्व का स्वभावतः अस्तित्व नहीं है।
छंद 31
यदि सब कुछ स्वभाव-रहित है, तो बंधन और मोक्ष का भी कोई स्वभावतः अस्तित्व नहीं है।
जो स्वभावतः बंधा नहीं है, वही स्वभावतः मुक्त भी नहीं हो सकता।
छंद 32
यदि बंधन होता, तो वह स्थायी होता।
यदि मोक्ष होता, तो वह भी स्थायी होता।
परंतु जो स्थायी नहीं है, उसका स्वभाव कैसे माना जाए?
छंद 33
जो बंधन में नहीं है, उसे मुक्त करने का कोई अर्थ नहीं है।
और जो मुक्त है, उसे मुक्त करने की प्रक्रिया भी असंगत है।
छंद 34
अज्ञान से बंधन और ज्ञान से मोक्ष —
यह विभाजन भी लोक-व्यवहार के अनुसार कहा गया है,
तत्त्वतः नहीं।
छंद 35
यदि अज्ञान स्वभावतः होता, तो वह कभी नष्ट नहीं हो सकता।
यदि वह नष्ट होता है, तो उसका स्वभाव नहीं है।
छंद 36
ज्ञान भी यदि स्वभावतः होता, तो वह उत्पन्न नहीं हो सकता।
और यदि उत्पन्न होता है, तो वह स्वभाव-रहित है।
छंद 37
इस प्रकार न अज्ञान का स्वभाव है,
न ज्ञान का।
और जहाँ दोनों का स्वभाव नहीं, वहाँ बंधन और मोक्ष की स्वभाविक सत्ता भी नहीं।
छंद 38
जो देखा जाता है, वह देखने वाले पर निर्भर है।
और देखने वाला दृश्य पर निर्भर है।
इन दोनों में से कोई भी स्वतंत्र नहीं है।
छंद 39
यदि दृश्य न हो, तो दृष्टा नहीं।
यदि दृष्टा न हो, तो दृश्य नहीं।
इस परस्पर निर्भरता में स्वभाव की कल्पना असंगत है।
छंद 40
इसी प्रकार श्रवण, स्पर्श, स्मरण और विचार —
सब अपने-अपने विषयों पर निर्भर हैं,
और विषय भी उन पर निर्भर हैं।
छंद 41
जो परस्पर निर्भर है,
वह न स्वतःसिद्ध है,
न परतःसिद्ध।
अतः वह शून्य है।
छंद 42
यदि आत्मा होती, तो वह क्रिया करती।
यदि क्रिया होती, तो कर्ता स्थिर होता।
परंतु न स्थिर कर्ता है, न स्थिर क्रिया।
छंद 43
कर्म कर्ता पर निर्भर है,
और कर्ता कर्म पर।
इस द्वैत में कोई भी तत्वतः सिद्ध नहीं।
छंद 44
यदि कर्म स्वभावतः होता,
तो फल अनिवार्य होता।
यदि फल अनिवार्य होता,
तो प्रयत्न का कोई अर्थ न रहता।
छंद 45
परंतु फल न तो अनिवार्य है,
न आकस्मिक।
वह केवल निर्भरता में प्रकट होता है।
छंद 46
इसलिए न पुण्य का स्वभाव है,
न पाप का।
वे केवल व्यवहार की संज्ञाएँ हैं।
छंद 47
यदि संसार वास्तविक होता,
तो निर्वाण असंभव होता।
और यदि निर्वाण वास्तविक होता,
तो संसार असंभव होता।
छंद 48
परंतु संसार और निर्वाण —
दोनों ही स्वभाव-रहित हैं।
इसलिए वे न भिन्न हैं, न अभिन्न।
छंद 49
जो संसार में शून्यता देखता है,
वह निर्वाण को खोजता नहीं।
और जो निर्वाण खोजता है,
वह संसार से भागता नहीं।
छंद 50
संसार से विमुख होना ही निर्वाण नहीं,
और संसार में लिप्त रहना ही बंधन नहीं।
छंद 51
जो शून्यता को वस्तु बना लेता है,
वह गहन भ्रांति में पड़ जाता है।
शून्यता भी शून्य ही है।
छंद 52
शून्यता का भी कोई स्वभाव नहीं है।
यदि उसमें स्वभाव होता,
तो वह स्वयं शून्य न रहती।
छंद 53
इसलिए बुद्ध ने शून्यता को
दृष्टि-नाश का उपाय कहा,
न कि नई दृष्टि।
छंद 54
जो शून्यता को पकड़ता है,
वह छूटता नहीं।
जो छोड़ देता है,
वही मुक्त कहलाता है।
छंद 55
किसी भी सिद्धांत को अंतिम सत्य मानना —
यही सबसे बड़ा बंधन है।
छंद 56
बुद्ध ने कोई मत स्थापित नहीं किया।
उन्होंने केवल मतों की असारता दिखाई।
छंद 57
जो कुछ कहा गया है,
वह लोक-व्यवहार के लिए कहा गया है।
परमार्थ में कुछ भी कहा नहीं जा सकता।
छंद 58
परमार्थ मौन नहीं है,
परंतु शब्दों में भी नहीं है।
छंद 59
जो जानता है कि कुछ भी जानने योग्य नहीं,
वही वास्तव में जानता है।
छंद 60
ज्ञान और अज्ञान —
दोनों ही कल्पनाएँ हैं।
उनसे परे जो है,
वह न कहा जा सकता है, न नकारा जा सकता है।
छंद 61
न आत्मा है,
न अनात्मा।
न दोनों हैं,
न दोनों का अभाव।
छंद 62
जो इन चारों को त्याग देता है,
वही मध्यम मार्ग में स्थित है।
छंद 63
मध्यम मार्ग कोई नया पथ नहीं,
वह केवल अतियों का अभाव है।
छंद 64
अस्तित्व और नास्तित्व —
दोनों अतियाँ हैं।
शून्यता उनका निरसन है।
छंद 65
इस निरसन में कोई वस्तु नहीं मिलती,
केवल भ्रांति का अंत होता है।
छंद 66
भ्रांति के अंत को ही
लोग निर्वाण कहते हैं।
छंद 67
परंतु निर्वाण भी कोई वस्तु नहीं,
कोई अवस्था नहीं,
कोई स्थान नहीं।
छंद 68
जहाँ कुछ पकड़ने योग्य नहीं रहता,
वहीं बोध प्रकट होता है।
छंद 69
यह बोध न उत्पन्न होता है,
न नष्ट होता है।
क्योंकि वह कभी बंधा ही नहीं था।
छंद 70
इस प्रकार जो कुछ भी कहा गया,
वह शून्यता के कारण संभव हुआ।
और जो शून्यता को समझता है,
वह किसी मत में नहीं उलझता।