शून्यता सप्तति छंद 1 — सब शून्य है, सब झूठ है

शून्यता सप्तति - छंद 1
बोध प्रत्यूषा | 21 सितम्बर, 2023

बुद्ध ने स्थिति, उत्पत्ति, विनाश, सत्, असत्, हीन, मध्यम, उत्कृष्ट आदि का उल्लेख लोक व्यवहार का अनुसरण करते हुए किया है, न कि इसलिए कि ये तत्वतः हैं।

सब शून्य है। व्यावहारिक सत्य से परमार्थिक सत्य तक नहीं पहुँच सकता।

सब कुछ शून्य क्यों है?
सब शून्य है, क्योंकि गति है लेकिन गति करने वाला कोई नहीं है। मनुष्य केवल गति का अनुभव करता है, कर्ता नहीं। इलेक्ट्रॉन प्रोटॉन से प्रेम करे या नाचे, यह केवल गति है; मनुष्य भी उसी तरह चलता है। जन्म, जीना, मरना—सब झूठ है। स्थिति, उत्पत्ति, विनाश केवल रूपांतर हैं; असली सत्य उनसे परे है।


तर्क और अहंकार का क्या स्थान है?
नागार्जुन तर्क को सर्वोच्च मानते हैं। जो तर्क से साबित नहीं होता, उसे न मानें। तर्क भी शून्य की ओर ले जाता है। अहंकार एक फर्जी पहचान है; यह हमेशा पाने की चाह में रहता है। अहंकार को आत्मा समझने का भ्रम ही दुख और बंधन पैदा करता है।


सत्य और शब्द का क्या संबंध है?
सत्य शब्दों से बहुत ऊपर है। शब्द केवल समझाने के साधन हैं; जब अर्थ समझ में आ जाए, शब्द भूल जाते हैं। हीन, मध्यम, उत्कृष्ट जैसी श्रेणियाँ केवल लोग समझने के लिए बनाए गए हैं। अगर किसी को तुमसे ऊपर या नीचे समझा जा सके, तो मुक्ति नहीं है। सत्य की खोज में केवल सहारा देना आवश्यक है, इसे करुणा कहते हैं।


अंदर की आग और निर्वाण का क्या अर्थ है?
अग्नि और जलने वाला अलग नहीं हैं। दुःख देखने वाला कोई नहीं है, फिर भी अहंकार जल रहा है और भोग रहा है। निर्वाण का मतलब यह नहीं कि जलने से लाभ मिलेगा, बल्कि यह देख लेना है कि तुम स्वयं नहीं हो। जैसे हॉर्न बजता है, वैसे मनुष्य बोलता है—आवाज होती है, कोई उसे नियंत्रित नहीं करता।


गुरु और शिष्य का क्या संबंध है?
प्रश्न पूछना मार्ग खोलता है; बिना प्रश्न ज्ञान दीवार बन जाता है। गुरु-शिष्य का रिश्ता ध्यानदृष्टि पर आधारित होना चाहिए। खोज और सहारा देने की प्रक्रिया ही शिक्षण का असली स्वरूप है।


निष्कर्ष
सब शून्य है। जन्म, जीना, मरना केवल भ्रम हैं। तर्क और शब्द साधन हैं, पर सत्य उनसे परे है। अहंकार को आत्मा मानने से मुक्ति संभव नहीं। शून्यता का अनुभव केवल स्वयं के निरीक्षण, सहारा देने और करुणा के माध्यम से होता है। खोज में प्रश्न पूछना और मार्ग दिखाना गुरु का कार्य है।