ताओ ते चिंग अध्याय 14 — देखो-उसे देखा नहीं जा सकता

ताओ ते चिंग – अध्याय 14
बोध प्रत्यूषा | 11 दिसम्बर 2025

देखो-उसे देखा नहीं जा सकता।
सुनो-उसे सुना नहीं जा सकता।
छुओ-उसे छुआ नहीं जा सकता।
ऊपर है, पर प्रकाशित नहीं,
नीचे है, पर अंधकार नहीं।

निर्बाध, नामरहित—
वह शून्य में लौट जाता है।
रूपों से परे,
छवियों से रहित,
सूक्ष्मतम से भी सूक्ष्मतर—
कल्पना से परे।
उसका न आदि है, न अंत।
उसे जाना नहीं जा सकता—
केवल अपने जीवन में सहज होकर उसे जिया जा सकता है।
अपने स्रोत को जानो—
यही ज्ञान का सार है।

ज्ञान का स्रोत क्या है?
ज्ञान का वास्तविक सागर वही है जहाँ से हम आते हैं — हमारा स्रोत, शून्यता। सब कुछ इसी शून्य से उत्पन्न होता है और उसी में विलीन हो जाता है। यदि ज्ञान में कोई फासला हो, तो वह टूट जाएगा। ज्ञान अपने दुख, अपने अनुभवों और स्वयं की सीमाओं से शुरू होता है। जन्म, मरण, सुख और दुख — सब अनुभवों के माध्यम से हमें यह समझ आता है कि अहंकार ही असत्य का निर्माण करता है और वास्तविकता से हमें दूर ले जाता है।


अहंकार और प्रेम का सम्बन्ध क्या है?
अहंकार स्वयं को मूर्ख बनाता है, अपूर्ण को पूर्ण समझने की कोशिश करता है, और छवियों के पीछे फँसकर वास्तविकता को नहीं देखता। सच्चा प्रेम वही है जो शून्य को चाहता है, रूपों और कल्पनाओं से परे। प्रेम केवल बाहरी अनुभूतियों का नाम नहीं, बल्कि उस स्रोत की अनुभूति है जो निरंतर उत्पन्न और लोप होता है। इसलिए अध्यात्म का अर्थ है खुद को खाली करना — ग्लास में पहले से खाली है, लेकिन जो भी शेष है उसे भी छोड़ देना, अहंकार से मुक्त होना।


हमारे जीवन में इसका क्या उपयोग है?
अपने स्रोत को जानना जीवन का मूल उद्देश्य है। जब हम स्वयं और अपने अनुभवों की वास्तविकता को देखते हैं, तो ज्ञान की गहराई में उतरते हैं। ताओ हमें याद दिलाता है कि बाहरी चीजों, छवियों और कल्पनाओं के पीछे न फँसें, बल्कि अंदर की शून्यता और सहज जीवन में रहकर इसे जियें। यही परम सत्य है, और यही ज्ञान का सागर है।


निष्कर्ष
ताओ = शून्यता = आत्मा = ब्रह्म। रूपों, छवियों और कल्पना से परे, न आदि है न अंत। अपने स्रोत को जानो, अपने दुख और अनुभव से ज्ञान प्राप्त करो। प्रेम वही है जो शून्य को चाहता है। अहंकार से मुक्त होकर, सहज होकर जीवन में रहो — यही अध्याय 14 का संदेश है।