जगत में कैसा नाता रे
मन फूला फूला फिरे, जगत में कैसा नाता रे ॥
माता कहे यह पुत्र हमारा, बहन कहे बीर मेरा,
भाई कहे यह भुजा हमारी, नारी कहे नर मेरा,
जगत में कैसा नाता रे ॥
पेट पकड़ के माता रोवे, बांह पकड़ के भाई,
लपट झपट के तिरिया रोवे, हंस अकेला जाए,
जगत में कैसा नाता रे ॥
घर की तिरिया ढूंढन लागी, ढुंडी फिरि चहु देशा,
कहत कबीर सुनो भई साधो, एक नाम की आसा,
जगत में कैसा नाता रे ॥
~ कबीर साहब
“मन फूला फूला फिरे, जगत में कैसा नाता रे ॥
मन अहंकार से भरा है, तो संसार में रिश्तों का क्या महत्व है?
“माता कहे यह पुत्र हमारा, बहन कहे बीर मेरा,
भाई कहे यह भुजा हमारी, नारी कहे नर मेरा,
जगत में कैसा नाता रे ॥
माँ कहती है, यह मेरा बेटा, बहन कहती है, यह मेरा भाई,
भाई कहता है, यह मेरी शक्ति, और नारी कहती है, यह मेरा पति,
लेकिन इन रिश्तों का असल सार क्या है इस संसार में?
“पेट पकड़ के माता रोवे, बांह पकड़ के भाई,
लपट झपट के तिरिया रोवे, हंस अकेला जाए,
जगत में कैसा नाता रे ॥
माँ पेट पकड़ कर रोती है, भाई बांह पकड़ कर,
नारी अपने दुख में रोती है, लेकिन हंस अकेला उड़ जाता है,
तो रिश्तों का क्या वास्तविक अर्थ है?
“घर की तिरिया ढूंढन लागी, ढुंडी फिरि चहु देशा,
कहत कबीर सुनो भई साधो, एक नाम की आसा,
जगत में कैसा नाता रे ॥
घर की नारी चारों ओर अपने पति को ढूंढती है,
कबीर कहते हैं, सुनो साधो, केवल एक नाम (ईश्वर) पर विश्वास रखो,
तो इस संसार में रिश्तों का असली मतलब क्या है?
यह भजन कबीर साहब के जीवन के अस्थायित्व और सांसारिक रिश्तों की असलियत को समझाने का प्रयास है। वे हमें यह सिखाते हैं कि जब तक हम किसी नाम (ईश्वर) में स्थिरता और शांति नहीं पाते, तब तक सांसारिक रिश्ते और बंधन केवल अस्थायी और भ्रमजनक होते हैं।