खलक सब रैन का सपना
खलक सब रैन का सपना ।
समझ मन कोई नहीं अपना ॥
कठिन है मोह की धारा ।
बहा सब जात संसारा ॥
घड़ा जो नीर का फूटा ।
पत्र ज्यों डार से टूटा ॥
ऐसे नर जात ज़िंदगानी ।
अजहुँ तौ चेत अभिमानी ॥
निरखि मत भूल तन गोरा ।
जगत में जीवना थोरा ॥
तजो मद लोभ चतुराई ।
रहो निसंक जग माही ॥
सजन परिवार सुत दारा ।
सभी एक रोज़ है न्यारा ॥
निकसि जब प्रान जावैंगे ।
कोई नहीं काम आवेंगे ॥
सदा जिनि जान यह देही ।
लगा ले नाम से नेही ॥
कहें कबीर अविनासी ।
लिये जम काल को फांसी ॥
~ कबीर साहब
“खलक सब रैन का सपना।
समझ मन कोई नहीं अपना ॥”
यह पूरी प्रकृति रात के स्वप्न की तरह है।
हे मन, इसमें किसी को भी अपना मत मान।
आध्यात्मिक अर्थ:
यहाँ संसार को झूठा नहीं कहा जा रहा —
यहाँ अहंकार के देखने के तरीके को उजागर किया जा रहा है।
“सपना” वस्तुओं का नहीं, पहचान का है।
सब कुछ जानते हुए भी जो बंधन बना रहता है, वही सपना है।
पहला सत्य यह नहीं कि “संसार माया है”,
पहला सत्य यह मानना है — “मैं समझा नहीं।”
“कठिन है मोह की धारा।
बहा सब जात संसारा ॥”
मोह की धारा बहुत कठिन है,
सारा संसार उसी में बह रहा है।
आध्यात्मिक अर्थ:
मोह अज्ञान नहीं, आदत है।
सब जानते हैं — गीता, उपनिषद, कबीर, बुद्ध —
फिर भी बहते हैं, क्योंकि
ज्ञान अहंकार की खुराक बन गया है।
जो ज्ञान मुक्त करे, वही अगर “मैं जानता हूँ” बन जाए,
तो वही सबसे बड़ा बंधन है।
“घड़ा जो नीर का फूटा।
पत्र ज्यों डार से टूटा ॥”
जैसे पानी का घड़ा टूट जाता है,
जैसे पत्ता डाल से गिर जाता है।
आध्यात्मिक अर्थ:
यह देह या संसार की निंदा नहीं है।
यह अहंकार की भूल दिखा रहा है —
जो अस्थायी से स्थायित्व माँगता है।
विषय टूटते नहीं,
अपेक्षाएँ टूटती हैं।
“ऐसे नर जात ज़िंदगानी।
अजहुँ तौ चेत अभिमानी ॥”
ऐसी ही है मानव जीवन की गति,
फिर भी अहंकार अब तक नहीं चेता।
आध्यात्मिक अर्थ:
अहंकार कहता है —
“मैं तो ठीक हूँ, दुनिया खराब है।”
यही सबसे बड़ा छल है।
दोष बाहर नहीं,
संबंध बनाने वाले ‘मैं’ में है।
“निरखि मत भूल तन गोरा।
जगत में जीवना थोरा ॥”
सुंदर शरीर देखकर मत भूलो,
यह जीवन बहुत थोड़े समय का है।
आध्यात्मिक अर्थ:
यह वैराग्य नहीं सिखा रहा।
यह कह रहा है —
जो थोड़े समय का है, उससे पूर्णता मत माँगो।
थके हो तो विश्राम चाहिए,
विषय नहीं।
“तजो मद लोभ चतुराई।
रहो निसंक जग माही ॥”
अहंकार, लोभ और चालाकी छोड़ो,
दुनिया में निडर होकर जियो।
आध्यात्मिक अर्थ:
कोई कर्म बुरा नहीं,
कोई विषय अपवित्र नहीं।
अपवित्र है — अहंकार की माँग।
जब माँग गिरती है,
दुनिया अपने-आप खेल बन जाती है।
“सजन परिवार सुत दारा।
सभी एक रोज़ है न्यारा ॥”
मित्र, परिवार, पुत्र और पत्नी —
एक दिन सब अलग हो जाएंगे।
आध्यात्मिक अर्थ:
यह त्याग का उपदेश नहीं।
यह शिकायत बंद करने की बात है।
जो सीमित है, वह सीमित ही देगा।
अगर तुम अपनी अपेक्षा नहीं निभा सकते,
दूसरे कैसे निभाएँ?
“निकसि जब प्रान जावैंगे।
कोई नहीं काम आवेंगे ॥”
जब प्राण निकलेंगे,
कोई साथ नहीं आएगा।
आध्यात्मिक अर्थ:
यह डराने की बात नहीं।
यह जिम्मेदारी की बात है।
अंत में कोई नहीं छूटता —
अहंकार खुद को अकेला छोड़ देता है।
“सदा जिनि जान यह देही।
लगा ले नाम से नेही ॥”
इस देह को सदा का मत मानो,
नाम से प्रेम जोड़ो।
आध्यात्मिक अर्थ:
“नाम” मंत्र नहीं —
पहचान का स्थानांतरण है।
देह से हटकर उस पर टिकना
जो बदलता नहीं।
“कहें कबीर अविनासी।
लिये जम काल को फांसी ॥”
कबीर कहते हैं — जो अविनाशी से जुड़ गया,
उसने काल को ही समाप्त कर दिया।
आध्यात्मिक अर्थ:
काल देह का होता है,
आत्मा का नहीं।
जब “मैं” सही जगह टिक जाता है,
तो मृत्यु भी डर नहीं रहती।
सार
यह भजन संसार को दोष नहीं देता।
यह अहंकार की चाल को उजागर करता है।
यह कहता है —
“सारी बातें सुनी-सुनी हैं,
इसीलिए खतरनाक हैं।”
क्योंकि अहंकार
सब जानता है,
पर समझता नहीं।
समस्या संसार नहीं,
समस्या यह है कि
हम ‘मैं’ को गलत जगह रखे बैठे हैं।
जब यह दिख जाता है,
तो न त्याग चाहिए,
न शिकायत —
फिर यह पूरा जगत
माँ की गोद बन जाता है।