खलक सब रैन का सपना सत्र 1 — न अहंकार सत्य है, न विषय से संबंध

खलक सब रैन का सपना - सत्र 1

खलक सब रैन का सपना - सत्र 1 अवलोकन
संत सरिता सत्र | 29 जनवरी

खलक सब रैन का सपना।
समझ मन कोई नहीं अपना॥


सबसे पहले यह मानना क्यों ज़रूरी है — “मैं नहीं समझा”
यह भजन जाना-पहचाना लगता है, और यही इसका खतरा है। जो परिचित लगता है, अहंकार उसे बिना बदले निगल लेता है। वह कहता है—“यह तो मुझे पहले से पता है।” और जो पहले से पता है, वह जीवन में कोई बदलाव नहीं लाता। लोग बहुत कुछ जानते हैं, लेकिन जानकर भी वही रहते हैं जो थे। इसलिए पहला वाक्य ज्ञान का नहीं, ईमानदारी का है—“मैं नहीं समझा।”


सब जानते हैं, फिर भी दुःख क्यों है
हमने सुना है—“संसार माया है।”
हमने पढ़ा है—“अहं ब्रह्मास्मि।”
हमने गीता, बुद्ध, संत, शास्त्र—सब देख लिया है।
अगर सच में जानते होते, तो दुःख क्यों बचा होता? ज्ञान अंधकार को मिटा देता है। अगर जीवन नहीं बदला, तो स्पष्ट है—ज्ञान भीतर पहुँचा ही नहीं। कारण सीधा है: अहंकार ज्ञान को भी विषय बना लेता है।


यह भजन संसार को नहीं, अहंकार को झूठा कहता है
यहाँ “खलक” यानी प्रकृति को झूठा नहीं कहा गया।
यहाँ संसार का निषेध नहीं है।
यहाँ झूठा ठहराया गया है—अहंकार
सपना बाहर नहीं है; सपना वह “मैं” है जो खुद को केंद्र मानता है।


विषयों का नहीं, मूर्खता का त्याग
अध्यात्म को हमने गलत समझ लिया। हमने मान लिया कि त्याग का मतलब जीवन छोड़ना है। नहीं। वैराग्य का अर्थ है—मूर्खता छोड़ना। विषय नहीं, उनसे बनी कल्पनाएँ झूठी हैं। अगर संसार माया है, तो यह पूछना पड़ेगा—“मैं कौन हूँ?” अगर यह प्रश्न नहीं उठा, तो त्याग भी अहंकार की चाल है।


अहंकार कैसे खुद को बचाता है
अहंकार कभी खुद को दोषी नहीं मानता।
वह कहेगा—दुनिया खराब है, लोग गलत हैं, मैं तो सीधा हूँ।
यह उसका बचाव-तंत्र है।
जहाँ भी दोष बाहर जा रहा है, समझ लो—अहंकार सुरक्षित है।


“समझ मन कोई नहीं अपना” का सीधा अर्थ
इसका अर्थ यह नहीं कि लोग धोखेबाज़ हैं।
इसका अर्थ यह है कि विषयों से बना कोई भी रिश्ता पूर्णता नहीं दे सकता। पूर्णता की अपेक्षा ही अहंकार की भूल है। वह विषयों से वही चाहता है जो उन्हें देना आता ही नहीं।


तुम्हें सच में चाहिए क्या
धन, संबंध, पहचान—यह सब ज़रूरत नहीं है। यह अहंकार की आवाज़ है। जब तुम्हें खुद नहीं पता कि तुम्हें क्या चाहिए, तो दूसरों से क्या मांग रहे हो? और फिर थककर कहते हो—“सब छोड़ दूँगा।” यह त्याग नहीं है, यह हताशा है।


जगत से भागना नहीं, जगत से खेल
जगत त्यागने की चीज़ नहीं है।
जगत खेलने की जगह है।
जैसे बच्चा माँ की गोद में खेलता है—न डर, न हिसाब।
दिक्कत तब शुरू होती है जब बच्चा खुद को माँ से अलग मान लेता है।


अध्यात्म हमेशा “मैं” से शुरू होता है
अगर अध्यात्म में किसी को दोष दिया जा रहा है, तो समझ लो—दोष वहीं है जहाँ रिश्ता बनाया गया। अध्यात्म बाहर सुधार नहीं है। यह देखने की प्रक्रिया है—कि “मैं” क्या हूँ।


अच्छा-बुरा कर्म नहीं, अहंकार बनाता है
कोई कर्म अपने-आप अच्छा या बुरा नहीं होता।
समस्या विभाजन की है।
हमने खेल को छोड़कर हिसाब शुरू कर दिया।
सिर्फ़ एक ही चीज़ अपवित्र है—अहंकार।
आत्मा को सुधार की ज़रूरत नहीं होती।


धर्म कोई समूह नहीं है
धर्म का अर्थ है—मैं और मेरी सच्चाई।
यह कोई पहचान-समूह नहीं है।
यह एक आंतरिक एकता है—अहंकार और आत्मा के बीच।
जब तक यह एक नहीं होते, बेचैनी बनी रहती है।


“मैं गलत हूँ” कहकर दुःखी क्यों हो
गलती का मतलब आत्म-दंड नहीं है।
दूसरा सज़ा पाए—यह न्याय है।
तुम सालों दुःखी रहो—यह मूर्खता है।
दूसरे का अपराध तुम क्यों ढो रहे हो?


सही देख रहे हो या नहीं—कैसे पता चले
यह ज्ञान का नहीं, नज़र का सवाल है।
कोई एक गीत में खुद को देख लेता है,
और कोई ग्रंथों में भी नहीं।
खुद को देखना—यानी अहंकार को देखना।


अहंकार हटेगा नहीं, समझ में आएगा
अहंकार कोई वस्तु नहीं है।
वह देखने-भोगने की प्रक्रिया है।
जब तक शरीर है, वह रहेगा।
मुद्दा उसे मारना नहीं—उसे पहचानना है।
पहचान हो तो खेल बन जाता है।


आत्म-आवलोकन (व्यक्तिगत)

यह शास्त्र नहीं है।
यह मेरा अनुभव है।

मैं कई बार भूल जाता हूँ कि जीवन बदलना चाहिए।
यही वजह है कि यह भजन मुझे “सुना-सुना” लगता है—
और इसीलिए यह खतरनाक है।

अक्सर मुझे लगता है कि मुझे पता है
कि यहाँ किस बात की ओर इशारा हो रहा है।
लेकिन सच यह है कि
मैं चीज़ों को अपनी स्मृतियों और कल्पनाओं के अनुसार देखता हूँ,
सत्य के अनुसार नहीं।

इस सत्र में सबसे ज़रूरी बात
मेरे लिए यही रही—
“मैं नहीं समझा।”

यह स्वीकार करना
अज्ञान का नहीं,
ईमानदारी का संकेत है।

मुझे यह भी लगता रहा है कि अहंकार को पूरी तरह मार देना चाहिए।
आज साफ़ दिखा कि यह एक भ्रम है।
अहंकार शरीर से उत्पन्न है। जब तक शरीर है, अहंकार रहेगा।

इसलिए उससे युद्ध का अर्थ उसका अंत नहीं है,
बल्कि उसे पहचानना है।

अब समझ आता है कि अहंकार के साथ खेल भी हो सकता है—
कभी वह साथ होगा, कभी विरोध में।
हर बार उसे दुश्मन बनाना ज़रूरी नहीं।

खलक सब रैन का सपना
अहंकार एक कल्पना है,
और जो उसे सत्य मान लेता है
वह उसी कल्पना में जीता है।

समझ मन कोई नहीं अपना
अहंकार को विषयों से कभी पूर्णता नहीं मिलती।
विषयों के साथ जो अर्थ मैंने गढ़े हैं,
वे ही मेरा भ्रम हैं।

याद रखने की कोशिश यही है— देखते रहना।
और बार-बार यह मान लेना कि मैं अभी भी सीख रहा हूँ।