खलक सब रैन का सपना सत्र 2 — कठिन है मोह की धारा, बहा सब जात संसारा

खलक सब रैन का सपना - सत्र 2 अवलोकन
संत सरिता सत्र | 4 फ़रवरी 2026

कठिन है मोह की धारा ।
बहा सब जात संसारा ॥

शुरुआत — “मुझे नहीं पता”
यहीं से ईमानदारी शुरू होती है। जो सच में नहीं जानता वही सीख सकता है। अगर सच में मोह‑माया समझ ली होती तो अब तक मुक्त हो चुके होते, क्योंकि विद्या की पहचान ही मुक्ति है। “मुझे आता है” — यही अहंकार का पहला झूठ है।

ज्ञान सरल है, अहंकार जटिल बनाता है
संतों ने ऊँची बातें सरल शब्दों में दीं, पर अहंकार कहता है — “मैं तेज हूँ, मुझे सब आता है।” जब बात कठिन कही जाए तो बहाना — “बहुत मुश्किल है।” जब सरल कही जाए तो बहाना — “इतनी आसान चीज़ क्यों पढ़ें?” निष्कर्ष एक — पढ़ना ही नहीं है।

मोह — लोकधर्म में
मन ने मोह को मीठा बना दिया है। “दादी को पोते से मोह है” — यह सुनकर प्रेम समझ आता है, खतरा नहीं। हमारी भाषा में मोह = लगाव = मिठास। लोकधर्म ने भ्रम को सजाकर स्वीकार्य बना दिया है, इसलिए उसका विष दिखता ही नहीं।

मोह — लगाव नहीं, भ्रम है
मोह वह भ्रम है जो सब नष्ट कर देता है, जैसे किसी पर भूत चढ़ जाना — चेतना पर कब्ज़ा। अनुभव असली लगता है पर सत्य नहीं होता।

बहा सब जात संसारा — पहली गलतफहमी
मन तुरंत कहता है — “पूरा ब्रह्मांड भ्रम में है।” यह गलत है। बादल, नदी, पत्थर भ्रमित नहीं होते। ब्रह्मांड में अनगिनत आकाशगंगाएँ हैं — वे कैसे बह जाएँगी? दर्शन तर्क माँगता है।

संसार — बाहर नहीं, भीतर का अनुभव
“संसार” बाहरी सत्ता नहीं, भ्रमित “मैं” की दृष्टि है। जब मैं भ्रमित हूँ तो सब उल्टा‑पुल्टा दिखता है। बादल, नदी, पत्थर में कल्पनाएँ दिखने लगती है। अहंकार भी ऐसा ही है — अनुभव होता है पर खोजो तो मिलता नहीं। प्रतीत सच्चा, अस्तित्व झूठा।

लोकधर्म बनाम धर्म
धर्म = आत्मज्ञान। लोकधर्म = नाच, हुल्लड़, भावनात्मक कहानियाँ। आज post‑truth युग में लोग मूर्खतापूर्ण धार्मिक कथाओं से दूर हो रहे हैं क्योंकि उनमें तर्क नहीं है।

मान्यता नहीं, दर्शन चाहिए
किसी गुरु या किताब की बात अंधविश्वास से नहीं माननी। हर बात का दर्शन खोजो, वरना वह केवल मान्यता है।

प्रेम क्या है
प्रेम कोई सिखा नहीं सकता — वह निर्णय है। खुद से ऊबना प्रेम की शुरुआत हो सकती है। प्रेम = “मैं न रहूँ, तू रहे।” जो खुद को राजा मानता है, वह मिटने को तैयार नहीं होगा। ऋषियों ने इसे एसा कहा “तू तू करता तू हुआ” — यहाँ “तू” वेदान्त में परम है, व्यक्तिगत नहीं। प्रेम का अर्थ फिदा होना, न्योछावर होना — इसके लिए पहले अपनी सीमितता देखनी पड़ती है।

कठिन क्यों है मोह की धारा?
क्योंकि अहंकार जन्म से साथ आता है। सबसे कठिन है खुद को देखना। मनुष्य जटिल है इसलिए उसका अहंकार भी जटिल है। भारत ने इसे समझा — जिसने खुद को जीता वही स्वामी, वही चक्रवर्ती।

नादानी और बेईमानी
अहंकार हर चीज़ का मालिक बनता है — “मैं करता हूँ, मैं सोचता हूँ, मैं पाता हूँ।” जिस चीज़ से जन्म से जुड़े हो, उसे परखना कठिन लगता है — यहाँ नादानी भी है और बेईमानी भी।
नादानी — पता नहीं कैसे देखना है, इसका इलाज आत्म‑अवलोकन है।
बेईमानी — स्वार्थ इतने हैं कि देखना ही नहीं चाहते, इसका इलाज नीयत है।

तुम खुद को नहीं जानते, दूसरों को कैसे समझोगे?
जब भीतर क्या चल रहा है, यह ही स्पष्ट नहीं तो बाहर का संबंध कैसा होगा? यही “बहा सब जात संसारा” है — भ्रमित मन अपना ही संसार बहा देता है।

धारा — अहंकार का सतत प्रवाह
अहंकार समाप्त नहीं होता, रूप बदलता रहता है। एक धारा की तरह बहता है — कभी ज्ञान का अहंकार, कभी भक्ति का, कभी त्याग का।

बहा सब जात संसारा — सही अर्थ
बहना = जड़ से उखड़ जाना। पेड़ बह रहा है तो उसकी जड़ नहीं रही। तुम्हारा संसार आधारहीन है क्योंकि वह तुम्हारी भ्रमित दृष्टि पर टिका है। जो कुछ तुम देखते हो, वह तुम्हारी ही चेतना की रचना है। यह केवल सपना नहीं — दुखद सपना है।

अंतिम स्पष्टता
मोह की धारा कठिन है क्योंकि वह जन्मजात है और मीठी दिखती है। संसार नहीं बह रहा — भ्रमित “मैं” बह रहा है। जड़ से कटे अनुभवों का संसार आधारहीन है। मुक्ति की शुरुआत वहीं है जहाँ “मुझे नहीं पता” की सच्चाई से आत्म‑अवलोकन शुरू होता है।