माटी कुदम करेंदी यार वाह वाह माटी दी गुलज़ार

माटी कुदम करेंदी यार वाह वाह माटी दी गुलज़ार ।

माटी घोड़ा, माटी जोड़ा, माटी दा असवार ।
माटी माटी नूं दौड़ावे, माटी दा खड़कार ।
माटी माटी नूं मारन लग्गी, माटी दे हथियार।

जिस माटी पर बहुती माटी, सो माटी हंकार।
माटी बाग बगीचा माटी, माटी दी गुलज़ार ।
माटी माटी नूं वेखण आई, माटी दी ए बहार।

हस्स खेड फिर माटी होवे, सौंदी पाउं पसार ।

बुल्हा एह बुझारत बुज्झें, तां लाह सिरों भुई मार

~ बाबा बुल्लेशाह


“माटी कुदम करेंदी यार वाह वाह माटी दी गुलज़ार।”
यह संसार मिट्टी का ही खेल है — मिट्टी ही अपनी शोभा रचती है।

आध्यात्मिक अर्थ:
जो कुछ दिखाई देता है, सब माटी ही है। अलग-अलग रूप दिखते हैं, पर सार एक ही है। प्रकृति स्वयं को ही प्रकट कर रही है।


“माटी घोड़ा, माटी जोड़ा, माटी दा असवार।”
“माटी माटी नूं दौड़ावे, माटी दा खड़कार।”
“माटी माटी नूं मारन लग्गी, माटी दे हथियार।”

घोड़ा भी मिट्टी, सवार भी मिट्टी।
मिट्टी ही मिट्टी को दौड़ा रही है, शोर भी उसी का है।
मिट्टी ही मिट्टी को मार रही है, मिट्टी के ही हथियारों से।

आध्यात्मिक अर्थ:
कर्ता, कर्म और करण — तीनों एक ही हैं।
अहंकार की दृष्टि से अलग-अलग दिखता है, पर वास्तव में कोई दूसरा है ही नहीं।
संघर्ष भी आत्मा का अपने ही रूपों से खेल है।


“जिस माटी पर बहुती माटी, सो माटी हंकार।”
“माटी बाग बगीचा माटी, माटी दी गुलज़ार।”
“माटी माटी नूं वेखण आई, माटी दी ए बहार।”

जिस मिट्टी पर और मिट्टी चढ़ जाती है, वही अहंकार बन जाता है।
बाग़, बहार, सौंदर्य — सब मिट्टी का ही विस्तार है।
मिट्टी स्वयं को देखने आई है — यही उसका उत्सव है।

आध्यात्मिक अर्थ:
जब ‘मैं’ अपने ऊपर और पहचानें चढ़ा लेता है, वही अहंकार बनता है।
संसार कोई और चीज़ नहीं, चेतना का ही खेल है — स्वयं को देखने की लीला।


“हस्स खेड फिर माटी होवे, सौंदी पाउं पसार।”
हँसते-खेलते अंत में सबको मिट्टी में ही लौट जाना है।

आध्यात्मिक अर्थ:
जीवन कोई युद्ध नहीं, एक खेल है।
अंत में सब रूप मिट जाते हैं — केवल तत्व बचता है।


“बुल्हा एह बुझारत बुझें, तां लाह सिरों भुई मार।”
बुल्ले शाह कहते हैं — अगर यह रहस्य समझ लो, तो सिर से अहंकार उतार दो।

आध्यात्मिक अर्थ:
समझ आ जाए कि “मैं” अलग नहीं हूँ — तो झुकना नहीं पड़ता, झुकाव अपने-आप गिर जाता है।
अहंकार मिटता नहीं, पहचान छूटती है।


सार

यह कविता किसी उपदेश की नहीं, बोध की रचना है।
यह कहती है —

“तुम जो खोज रहे हो, वही हो।
संघर्ष इसीलिए है क्योंकि तुम स्वयं को वस्तु समझ बैठे हो।”

जब यह दिख जाता है, तो न लड़ाई बचती है, न डर, न भारीपन।
बस सहजता — जैसे मिट्टी का होना।


माटी कुदम करेंदी यार || आचार्य प्रशांत, बाबा बुल्लेशाह पर (2023) - YouTube.