माया तजूं तजि नहिं जाइ
हर चीज़ माया है और माया के लिए लोग अपने प्राण त्याग देते है । लोग समजते नहीं की माया नहीं है वही ब्रह्म ज्ञान है । माया का नही बल्कि राम का आधार होना चाहिए ।
माया तजूं तजि नहिं जाइ
माया तजूं तजि नहिं जाइ,
फिर फिर माया मोहि लपटाइ।माया आदर माया मान,
माया नहिं तंह ब्रह्म ज्ञान।माया रस, माया कर जान,
माया कारनि तजे परान।माया जप तप माया जोग
माया बाँधे सबहि लोग।माया जल थलि माया अकासि,
माया व्यापी रही चहुं पासी।माया पिता माया माता,
अतिमाया अस्तरी सुता।माया मारि करै ब्योहार,
कबीर मेरे राम अधार।~संत कबीर
“माया तजूं तजि नहिं जाइ,
फिर फिर माया मोहि लपटाइ।”
माया को छोड़ना चाहता हूँ, लेकिन वह मुझे बार-बार अपनी ओर खींच लेती है।
“माया आदर माया मान,
माया नहिं तंह ब्रह्म ज्ञान।”
माया में आदर और मान होता है, लेकिन माया के भीतर ब्रह्म ज्ञान नहीं है।
“माया रस, माया कर जान,
माया कारनि तजे परान।”
माया का रस और माया का कार्य जानकर,
माया के कारण जीवन की श्वास तक समाप्त हो जाती है।
“माया जप तप माया जोग,
माया बाँधे सबहि लोग।”
माया में जप, तप और योग होते हैं,
माया सभी लोगों को अपने जाल में बांध लेती है।
“माया जल थलि माया अकासि,
माया व्यापी रही चहुं पासी।”
माया जल, थल और आकाश में है,
माया हर दिशा में व्यापी हुई है।
“माया पिता माया माता,
अतिमाया अस्तरी सुता।”
माया पिता और माया माता के रूप में है,
और माया सबसे बड़ी है, जो स्त्री और पुत्र के रूप में दिखाई देती है।
“माया मारि करै ब्योहार,
कबीर मेरे राम अधार।”
माया ने मुझसे कई व्यर्थ कार्य कराए,
कबीर कहते हैं, मेरी असली शरण तो राम हैं।
इस रूप में, भजन का अर्थ सरल और सटीक तरीके से व्यक्त किया गया है, जैसा आपने चाहा था। माया के बारे में कबीर साहब की गहरी शिक्षा दी गई है कि वह जीवन के हर क्षेत्र में व्याप्त है, लेकिन सच्चा ज्ञान और मुक्ति केवल राम के शरण में ही है।