ना मैं धर्मी नाहिं अधर्मी सत्र 7 — सत्य को तो सिर्फ एक बिरला बुझता है
ना मैं धर्मी नाहिं अधर्मी - सत्र 7
संत सरिता सत्र | 28 दिसम्बर 2025
या मत को कोई बिरला बूझै,
सो अटल हो बैठा हो।
सच कड़वा क्यों लगता है?
सच कड़वा होता है उन लोगों के लिए जो झूठ में फंसे हैं।
→ लोकधर्म ने तय कर दिया कि अहम क्या है, सारा संसार मालिक है अहम के।
ना मैं धर्मी नाहिं अधर्मी का अर्थ क्या है?
लोकधर्म से अलग रहना।
→ मैं न धर्मी हूँ, न अधर्मी। कर्म चलता रहेगा, अहंकार को छोड़ो।
क्या सच हमेशा आता है?
हाँ।
→ सच 100% प्रकट होगा। लेकिन जो झुननु में फंसे हैं, वह ईमानदारी से देख नहीं पाते।
क्यों लोग सत्य से दूर रहते हैं?
उनके अंदर 100 मालिक और 100 स्वार्थ जुड़े हुए हैं।
→ दिनभर दुख खाते हैं, प्रेम नहीं है। उनके सवाल को उखाड़ना मुश्किल है।
क्या लोग impractical कहते हैं?
हाँ। बिके हुए गुलाम कहते हैं।
→ अहंकार को दोनों चाहिए: गुलामी और आध्यात्मिक हिस्सा। सत्य के लिए गुलामी छोड़नी पड़ती है।
हम कैसे योद्धा बनें?
दुनिया तागत और पैसे के पीछे चलती है।
→ अपने पास शक्ति रखो। अहंकार को representational समझो।
→ लोगों की प्रतिक्रिया मायने नहीं रखती। “I don’t care whether you care or not.”
क्या मजबूर होना ठीक है?
नहीं।
→ मजबूरी छोड़ो। तागत और निर्णय खुद के पास रखो।
फेम और मान्यता क्यों जरूरी है?
फेम आ रही है तो दूसरों का भला भी हो रहा है।
→ रोकना असंभव है। श्रेष्ठ लोगों के पास हो तो कोई दिक्कत नहीं।
→ फेम चाहिए, नहीं तो सत्र भी नहीं हो पाएंगे।
अंतिम निष्कर्ष
सत्य हमेशा प्रकट होता है। अहंकार छोड़ो। मजबूर मत बनो। तागत, निर्णय और प्रेम अपने पास रखो। कर्म चलता रहेगा, तुम केवल साक्षी बनकर देखो।