ना मैं धर्मी नाहिं अधर्मी — कबीर न कुछ बनाते हैं, न कुछ मिटाते हैं

ना मैं धर्मी नाहिं अधर्मी - सत्र 8 अवलोकन
संत सरिता - 2 दिसम्बर

मत कबीर काहू को थापै,
मत काहू को मेटो हो ।।


हमारा कौन-सा काम है?
मत कबीर काहू को थापै, मत काहू को मेटो हो।
→ कर्म-विषय हमेशा चलेगा, लेकिन तुम उसे बनाना या मिटाना नहीं। तुम कर्ता नहीं, सिर्फ़ उपस्थित देखो।

मैं अलग होकर क्या कर सकता हूँ?
अपने आप को अलग करना मतलब यह नहीं कि कर्म नहीं होगा। कर्म चलता रहेगा, पर कर्ता अहंकार नहीं रहेगा।

अहम क्या है?
अहम फर्जी आईडी कार्ड है: “मैं ब्रह्म हूँ, मैं आत्मा हूँ”। यही अहंकार दुख पैदा करता है।

क्यों दुख आता है?
तुम दुख को मिटाने की कोशिश करते हो, वही कारण है। आत्मज्ञान न होने पर, तुम्हें दुख का सही पता नहीं।

अच्छा-बुरा कौन तय करता है?
लोकधर्म कर्म को अच्छा-बुरा बना देता है। असली सवाल: कर्ता कौन है। कर्म स्वयं अच्छा-बुरा नहीं।

मैं कैसे खुद को देखूँ?
बीमारी मेरा हिस्सा है, मैं बीमार नहीं। अपने विचार, भावना और कर्म को सिर्फ़ अवलोकन करो। जाना हुआ छोड़ो, अहंकार का बचाव मत करो।

सत्य क्या है?
सत्य मन में होगा, नहीं तो सिर्फ़ झूठ और मूर्खता। पुराने सबद हटा दो, नए सबद भी खुद हट जाएँ।

अवलोकन में तकलीफ क्यों होती है?
अहम डरता है कि देख लेने पर सफाई करनी पड़ेगी। असल में, देखने के बाद अहंकार बचता ही नहीं।

बचपन और समाज का झूठ
हम झूठ बोलते हैं कि घर ठीक है, बच्चे वैसे ही झूठ बोलते हैं। समाज अनुमति नहीं देता कि सच्चाई दिखाई जाए।

धन और स्थिति का उद्देश्य
पैसा केवल space खरीदने के लिए है। इंसान की असली चीज़ें पैसा नहीं ले सकता। अमीरों को दुनिया की समाप्ति से फ़र्क़ नहीं पड़ता।

क्यों ग़लतियां होती हैं?
क्रोध और लोग। जीवन जैसा है, वैसा क्रोध। कृष्ण को भी क्रोध था, फर्क केवल कारण का है।

हम किसे पूजते हैं और क्यों नहीं समझते?
हम उन्हें पूजते हैं जो हमारे दुख को हल करते हैं। प्रेम वास्तविकता को दें, उन लोगों को दें जिन्हें देख पाते हैं।

अंतिम संदेश:
ना मैं धर्मी नाहिं अधर्मी, ना मैं किसी का मित्र या शत्रु, ना मैं बंधा या मुक्ता, ना मैं जती या कामी। कर्म हमेशा चलता है, पर मैं उससे अलग। इसे देखकर रहो, किसी को थापो या मेटो मत।