नहिं मानै मूढ़ गँवार, मैं कैसे कहूँ समझाय
नहीं माने मूढ गंवार
नहिं मानै मूढ़ गँवार, मैं कैसे कहूँ समझाय ।
टेक झूठे को विश्वास करत है, साँचे नहिं पतियाय ।
आतम त्यागि अनातम पूजत, मूरख शीश नवाय ।
सज्जन संग विमल गंगाजल, तेहि तज तीरथ जाय ।
अपनो हित अनहित नहिं सूझे, रही अविद्या छाय ।
कहैं कबीर प्रत्यक्ष न माने, ताको कौन उपाय ।
~ कबीर साहब
“नहीं माने मूढ गंवार, मैं कैसे कहूँ समझाय।
मूर्ख और गंवार (अज्ञानी लोग) सच्चाई नहीं समझते, तो मैं उन्हें कैसे समझाऊं?
“टेक झूठे को विश्वास करत है, साँचे नहिं पतियाय।
ऐसे लोग झूठ पर विश्वास करते हैं, और सच्चाई को नहीं मानते।
“आतम त्यागि अनातम पूजत, मूरख शीश नवाय।
वे लोग आत्मा का त्याग कर, बिना आत्मज्ञान की पूजा करते हैं, यह मूर्खता है।
“सज्जन संग विमल गंगाजल, तेहि तज तीरथ जाय।
ऐसे लोग अच्छे साथियों (सज्जन) और शुद्धता (गंगाजल) को छोड़कर तीर्थ यात्रा करने जाते हैं, यह निरर्थक है।
“अपनो हित अनहित नहिं सूझे, रही अविद्या छाय।
इन्हें अपनी भलाई और बुराई का ज्ञान नहीं होता, क्योंकि अज्ञानता की छाया इन पर है।
“कहैं कबीर प्रत्यक्ष न माने, ताको कौन उपाय।
कबीर कहते हैं कि जो लोग सीधे प्रमाण (प्रत्यक्ष) को नहीं मानते, उन्हें क्या समझाया जा सकता है?
कबीर साहब इस भजन में यह सिखाते हैं कि जो लोग अज्ञानता में डूबे होते हैं, उन्हें सच्चाई दिखाने का कोई उपाय नहीं होता।