नैहरवा हमका न भावे
दुनिया किसी को भी पसंद नहीं होती । सबसे सुंदर के आत्मा और मेरा मन भी वही है ।
नैहरवा = मायका / दुनिया
ससुराल = आत्मा का घर
नैहरवा हमका न भावे, हमका न भावे।
साईं की नगरी परम अति सुन्दर, जहाँ कोई जावै न आवै।
चाँद सूरज यहाँ, पवन न पानी, कौ संदेश पहुँचावै।
दरद यह साईं को सुनावै, नैहरवा हमका न भावे।आगे चलौ पंथ न सूझै, पीछे दोष लगावै।
केहि विधि ससुरे जाऊँ मोरी सजनी, बिरहा जोर जरावै।
विषय रस नाच नचावै, नैहरवा हमका न भावे।बिन सतगुरु आपनो नहिं कोई, जो यह राह बतावै।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, सपनेहु प्रीतम न आवै।
तपन यह जिया की बुझावै, नैहरवा हमका न भावे।~ कबीर साहब
“दुनिया हमका न भावे, हमका न भावे।
मुझे यह संसार (दुनिया) अच्छा नहीं लगता, मुझे यह नहीं भाता।
“साईं की नगरी परम अति सुन्दर, जहाँ कोई जावै न आवै।
चाँद सूरज यहाँ, पवन न पानी, कौ संदेश पहुँचावै।
यहाँ दर्द अब मैं परम को सुनता हूँ, दुनिया हमका न भावे।”
साईं की नगरी अत्यंत सुंदर है, जहाँ कोई आता नहीं और न ही जाता है,
यहाँ चाँद, सूरज, हवा और पानी कुछ भी नहीं है, और कोई संदेश भी नहीं पहुँचता,
यहाँ दर्द अब मैं परम को सुनता हूँ। मुझे यह दुनिया नहीं भाती।
“आगे चलौ पंथ न सूझै, पीछे दोष लगावै।
केहि विधि ससुरे जाऊँ मोरी सजनी, बिरहा जोर जरावै।
विषय रस नाच नचावै, दुनिया हमका न भावे।”
आगे का रास्ता समझ में नहीं आता, पीछे से आरोप लगाए जाते हैं,
किस प्रकार ससुराल जाऊँ, और मेरी प्रिय का विरह मुझे जलाता है,
यह संसार के मोह में फंसने का कोई मतलब नहीं है, मुझे यह दुनिया नहीं भाती।
“बिन सतगुरु आपनो नहिं कोई, जो यह राह बतावै।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, सपनेहु प्रीतम न आवै।
तपन यह जिया की बुझावै, दुनिया हमका न भावे।”
सतगुरु के बिना कोई भी आत्मा अपना सही मार्ग नहीं जान सकती,
कबीर कहते हैं, सुनो साधो, प्रीतम (ईश्वर) सपने में भी नहीं आते,
यह संसार के दुख और तपन (दर्द) से आत्मा बुझ जाती है, मुझे यह दुनिया नहीं भाती।
इस भजन में कबीर साहब ने संसार के मोह और रिश्तों की अस्थिरता पर विचार किया है। वे कहते हैं कि सत्य और आत्मज्ञान के मार्ग में ही सच्ची शांति मिलती है, और मायका (संसार) की सभी सुख-सुविधाएं केवल अस्थायी हैं। कबीर साहब यह संदेश देते हैं कि सच्चे गुरु की तलाश और आत्मा का ज्ञान ही वास्तविक सुख का मार्ग है।