मेरी नैया पड़ी है मजधार
नैया पड़ी मझधार, गुरु बिन कैसे लागे पार॥
मैं अपराधी जन्म-जन्म का, मन में भरा विकार।
तुम दाता दुख भंजन, मेरी करो सम्हार॥
अंतरयामी एक तुम ही हो, जीवन के आधार।
जो तुम छोड़ो हाथ प्रभुजी, कैसे लागे पार॥
साहिब तुम मत भूलियो, लाख लो भूलग जाये।
हम से तुमरे बहुत हैं, तुम सा हमरा नाहिं॥
अवगुन दास कबीर के, बहुत गरीब निवाज़।
जो मैं पूत कपूत हूं, कहौं पिता की लाज॥
~ कबीर साहब
“नैया पड़ी मजधार, गुरु बिन कैसे लागे पार॥
मेरी जीवन की नाव भंवर में फंसी है, गुरु के बिना इसे पार कैसे लगा सकती है?
“मैं अपराधी जन्म-जन्म का, मन में भरा विकार।
तुम दाता दुख भंजन, मेरी करो सम्हार॥
मैं जन्मों-जन्मों से अपराधी हूं, और मेरे मन में विकार भरे हुए हैं,
हे प्रभु, तुम दाता हो और दुखों को नष्ट करने वाले हो, कृपया मेरी रक्षा करो।
“अंतरयामी एक तुम ही हो, जीवन के आधार।
जो तुम छोड़ो हाथ प्रभुजी, कैसे लागे पार॥
हे प्रभु, तुम ही सर्वज्ञ हो और जीवन के असली आधार हो,
यदि तुम अपना हाथ छोड़ दोगे, तो मेरी नाव कैसे पार लगेगी?
“साहिब तुम मत भूलियो, लाख लो भूलग जाये।
हम से तुमरे बहुत हैं, तुम सा हमरा नाहिं॥
हे प्रभु, तुम हमें कभी मत भूलना, चाहे लाखों भूलें जाएं,
हमसे तुम्हारा बहुत रिश्ता है, लेकिन तुम जैसा कोई नहीं है।
“अवगुन दास कबीर के, बहुत गरीब निवाज़।
जो मैं पूत कपूत हूं, कहौं पिता की लाज॥
दास कबीर के दोष बहुत हैं, और मैं गरीब हूं,
यदि मैं कपूत हूं, तो अपने पिता की लाज (सम्मान) कैसे रखूं?
इस भजन में कबीर साहब अपनी आत्मा के अपराधों और दोषों को स्वीकार करते हुए प्रभु से कृपा की प्रार्थना करते हैं। वे यह दर्शाते हैं कि बिना गुरु और प्रभु के आशीर्वाद के जीवन की कठिनाइयों से पार पाना असंभव है। यह भजन आत्मसमर्पण और विश्वास की शक्ति को रेखांकित करता है। कबीर साहब यह भी बताते हैं कि प्रभु से अलग कोई सहारा नहीं है, और अगर वह छोड़ दें तो जीवन की नाव डूब जाएगी।