पानी में मीन पियासी, मोहे सुन सुन आवत हाँसी
पानी में मीन पियासी, मोहे सुन सुन आवत हाँसी।।
आतमज्ञान बिना नर भटके, कोई मथुरा कोई काशी।।
जैसे मृगा नाभि कस्तूरी, बन बन फिरत उदासी।।
जल बिच कमल, कमल बिच कलियाँ,तापर भँवर निवासी।।
सो मन बस त्रयलोक भयो है, यति सती संन्यासी।।
जाको ध्यान धरे विधि हरिहर, मुनि जन सहस अठासी।।
सो तेरे घट माहिं बिराजे, परम पुरुष अविनाशी।।
है हाजिर तोहि दूर दिखावे, दूर की बात निरासी।।
कहैं कबीर सुनो भाई साधो, गुरु बिन भरम न जासी।।
~ कबीर साहब
“पानी में मीन पियासी, मोहे सुन सुन आवत हाँसी।।
पानी में मछली प्यासे होती है, और मुझे सुन-सुनकर हंसी आती है।
“आतमज्ञान बिना नर भटके, कोई मथुरा कोई काशी।।
जैसे मृगा नाभि कस्तूरी, बन बन फिरत उदासी।।”
आत्मज्ञान के बिना मनुष्य भटकता रहता है, कोई मथुरा जाता है, कोई काशी,
जैसे मृग अपनी नाभि में कस्तूरी की खुशबू खोजता है, और जंगल-जंगल उदास भटकता है।
“जल बिच कमल, कमल बिच कलियाँ, तापर भँवर निवासी।।
सो मन बस त्रयलोक भयो है, यति सती संन्यासी।।”
जल के बीच कमल है, और कमल के बीच कलियाँ हैं, जहाँ भँवरे निवास करते हैं,
वह मन त्रिलोकी (तीनों लोकों) में बस जाता है, जैसे यति और सती संन्यासी।
“जाको ध्यान धरे विधि हरिहर, मुनि जन सहस अठासी।।
सो तेरे घट माहिं बिराजे, परम पुरुष अविनाशी।।”
जिसका ध्यान विधि (ईश्वर) और हरिहर (भगवान विष्णु) करते हैं, मुनि और संत हजारों साल तक ध्यान करते हैं,
वह परम पुरुष (ईश्वर) तेरे शरीर में विराजमान है, जो अविनाशी है।
“है हाजिर तोहि दूर दिखावे, दूर की बात निरासी।।
कहैं कबीर सुनो भाई साधो, गुरु बिन भरम न जासी।।”
जो सामने है, उसे तू दूर दिखाता है, और दूर की बात निरर्थक लगती है,
कबीर कहते हैं, सुनो साधो, गुरु के बिना भ्रम से बाहर नहीं निकल सकते।
इस भजन में कबीर साहब ने आत्मज्ञान, गुरु की महिमा, और संसार के भ्रम को समझाया है। उन्होंने यह बताया है कि बिना आत्मज्ञान के व्यक्ति संसार में भटकता रहता है, जैसे मृग अपनी नाभि में कस्तूरी की खुशबू खोजता है, और जैसे जल में कमल और भँवरे रहते हैं। असल ज्ञान और सच्चाई तभी मिलती है जब हम गुरु के मार्गदर्शन में चलते हैं।