पिया मोर जागे मैं कैसे सोई री

पिया मोर जागे मैं कैसे सोई री ।

पांच सखी मेरे संग की सहेली, उन रंग रंगी पिया रंग ना मिली री ।

सास सयानी ननद दौरानी, उन ड़र ड़री पिया सार न जानी री ।
द्वादस पर सेज बिछानी, चढ़ न सकौं मेरी लाज लजानी री ।

रात दिवस मोहि कूका मारै, मैं न सुना रचि रही संग जानी री ।
कहे कबीर सुन सखी सयानी, बिन सतगुरू पिया मिलै न मिलानी री ।

~ कबीर साहब


मैं अपने पिया से कैसे अलग जो सकता हूँ ? अगर मेरे पिया हमेशा जागने है बो खुद गहराई, उत्तमता का प्रतीक है तो में कैसे कुछ और बानु ? मुझे लज्जा, भय, सांसरिक रंग में नहीं रहना । जब इन सबसे सबसे उपर उठके मैं सतगुरु की वाणी से अपने आप को थोड़ा हूँ तभी अपने पिया को पता हूँ ।

“पिया मोर जागे मैं कैसे सोई री।”

मेरा प्रिय जाग रहा है —
मैं फिर कैसे सो सकती हूँ?

आध्यात्मिक अर्थ:
जब चेतना जाग जाती है,
तो अज्ञान की नींद अपने-आप टूट जाती है।


“पांच सखी मेरे संग की सहेली, उन रंग रंगी पिया रंग ना मिली री।”

मेरी पाँचों सखियाँ (इंद्रियाँ) अपने-अपने रंगों में रमी रहीं,
पर उन्हें प्रिय का रंग न मिला।

आध्यात्मिक अर्थ:
इंद्रियाँ विषयों में उलझ जाती हैं,
पर सत्य का रंग केवल भीतर उतरता है।


“सास सयानी ननद दौरानी, उन डर डरी पिया सार न जानी री।”

सास सयानी थी, ननद चतुर थी,
उनसे डरके भय में रहीं — प्रिय का सार न जान सकीं।

आध्यात्मिक अर्थ:
चतुराई और भय से सत्य नहीं मिलता।
सत्य वहाँ खुलता है जहाँ निर्भयता है।


“द्वादस पर सेज बिछानी, चढ़ न सकौं मेरी लाज लजानी री।”

बारह पंखुड़ियों वाली सेज सजी थी,
पर लज्जा के कारण मैं उस पर चढ़ न सकी।

आध्यात्मिक अर्थ:
साधना की तैयारी बहुत हो सकती है,
पर अहंकार की संकोच-भावना मिलन से रोक देती है।


“रात दिवस मोहि कूका मारै, मैं न सुना रचि रही संग जानी री।”

रात-दिन कोई पुकारता रहा,
पर मैं न सुन सकी — संसार में ही रमी रही।

आध्यात्मिक अर्थ:
आह्वान भीतर से आता है,
पर बाहर की आसक्ति उसे दबा देती है।


“कहे कबीर सुन सखी सयानी, बिन सतगुरू पिया मिलै न मिलानी री।”

कबीर कहते हैं — सखी, यह समझ लो,
सतगुरु के बिना प्रिय का मिलन नहीं होता।

आध्यात्मिक अर्थ:
गुरु बाहर से नहीं, भीतर से जगाते हैं।
जागरण के बिना मिलन असंभव है।


सार

यह भजन विरह का गीत नहीं, जागरण की पुकार है।

यह कहता है —

प्रिय दूर नहीं है,
सोई हुई दृष्टि दूर है।

जब गुरु जगाते हैं,
तो न इंद्रियाँ बाधा बनती हैं,
न लज्जा,
न भय।

तब नींद टूटती है —
और मिलन अपने-आप घटता है।