राम भजा सो जीता जग में
सत्य, मुक्ति, आनंद, ब्रह्म को राम कहते है । राम को पाना मतलन मुक्तिपूर्ण, आनंदपूर्ण जीवन जीना । राम के लिए जीना मतलन आत्मप्रेम, मुक्ति, श्रेस्ठ्ता, उत्तमता के जीना ।
अगर तुमने परनन्द ब्रह्मरूप राम को भज लिए तो तुम आत्मिक स्तर पर सबसे ऊपर पहुच गए मतलब तुमने पूरा जग ही जीत लिया ।
राम भजा सो जीता जग में
राम भजा सो जीता जग में, राम भजा सो जीता ॥
हाथ सुमरनी, पेट कतरनी,
पढ़त भगवत गीता ॥हृदय शुद्ध किया नहीं बौरे,
कहत सुनत दिन बीता ॥आन देव की पूजा कीन्ही,
गुरु से रहा अमीता ॥धन, यौवन सब यहीं रहेगा,
अंत समय चले रीता ॥बावरिया ने भाँवर डारी,
मोह डाल सब कीता ॥कहें कबीर काल धर खैय्हें,
जैसे मृग को चीता ॥~कबीर साहब
“राम भजा सो जीता जग में,
राम भजा सो जीता ॥”
जो राम का भजन करता है, वही इस जगत में सच्चा जीता है।
- राम भजा → जो व्यक्ति राम (सत्य, मुक्ति, आनंद, ब्रह्म) का भजन करता है
- सो जीता जग में → वही वास्तव में जीवन में विजयी होता है।
राम को भजना -> सत्य के लिए आत्मप्रेम, श्रेस्ठ्ता, उत्तमता में लीन हो जाना
सत्य के बाद तो अहंकार बचता ही नहीं है - राम भजा सो जीता जग में
“हाथ सुमरनी, पेट कतरनी,
पढ़त भगवत गीता ॥”
हाथों में माला, पेट में संयम,
और भगवत गीता का पाठ करता है।
“हृदय शुद्ध किया नहीं बौरे,
कहत सुनत दिन बीता ॥”
लेकिन उसने अपने हृदय को शुद्ध नहीं किया,
दिन उसी ढंग से गुजार दिए।
हृदय शुद्ध नहीं करना -> मन के अंदर से निम्न स्तर की चीजों को न हटाना बिना अंतःशुद्धि के बाहरी धार्मिकता भ्रम है। मन यदि विकारमुक्त नहीं हुआ तो सारे उपदेश व्यर्थ हैं। आध्यात्मिकता का आरंभ भीतर की शुद्धि से होता है।
“आन देव की पूजा कीन्ही,
गुरु से रहा अमीता ॥”
वह दूसरे देवताओं की पूजा करता रहा,
पर गुरु की भक्ति से दूर रहा।
“धन, यौवन सब यहीं रहेगा,
अंत समय चले रीता ॥”
धन और यौवन सब यहीं रह जाएगा,
अंत में यह सब कुछ खाली हाथ जाएगा।
जीवन की सारी अस्थायी संपत्तियाँ शरीर के साथ मिट जाती हैं। केवल आत्मजागरूकता ही अमर है। इस क्षणभंगुरता को जानना ही विवेक का आरंभ है।
“बावरिया ने भाँवर डारी,
मोह डाल सब कीता ॥”
मोह के जाल में फंसकर बौराया,
सब कुछ मोह में किया।
“कहें कबीर काल धर खैय्हें,
जैसे मृग को चीता ॥”
कबीर कहते हैं, समय आकर पकड़ लेता है,
जैसे शेर मृग को पकड़ लेता है।
यह भजन कबीर साहब के जीवन के मूल सिद्धांतों को दर्शाता है—राम की भक्ति, गुरु की शिक्षा, और मोह के जाल से बचने की आवश्यकता। कबीर हमें यह सिखाते हैं कि बाहरी सुख-साधन और मोह से हम कुछ भी स्थायी नहीं पा सकते, सच्ची मुक्ति और जीवन की वास्तविकता राम और गुरु में है।