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INFINITY
हम अनंत है
We are Infinite
अद्वैत
हम अनंत है
We are Infinite
साधो ये मुर्दों का गाँव
ऋभु गीता अध्याय 4, श्लोक 10-20 — अनात्मा जैसा कुछ भी नहीं है
I Am Not in Time; Time Is Within Me
मैं समय में नहीं हूँ, समय मुझमे हैं
अवधूत गीता — जहाँ मैं नहीं, वहीं शिव
कर्म
चलना है दूर मुसाफ़िर
साधो ये मुर्दों का गाँव
क्या तन मांजतारे एक दिन माटी में मिल जाना
जन्म मरण के बारे में सोचे बोरे
कल मनुष्य आज ai, माया का ये खेला
माया
माया तजूं तजि नहिं जाइ
माटी कुदम करेंदी यार वाह वाह माटी दी गुलज़ार
रहना नहीं देस बिराना है
खलक सब रैन का सपना
माया मरी न मन मरा, मर मर गए शरीर
प्रेम
जिस तन लगिआ इश्क़ कमाल
इश्क़ है आसमां में उड़ के जाना
समझ देख मन मीत पियरवा
अब हम गुम हुए, गुम हुए, गुम हुए प्रेम नगर की सैर
पीले प्याला हो मतवाला
तोहि मोहि लगन लगाय रे फकीरवा
घड़ियाली दियो निकाल नी
हमन है इश्क मस्ताना
धर्म ओर कर्तव्य क्यो कहे, जीवन तो प्रेम
बोरे बनना चाहे कलाकार, मांगे जग का आदर
प्रेम ही पथ है: भक्ति और ज्ञान की आंतरिक एकता — भक्तिसूत्र भाग 1
प्रेम न्यौछावर होने की तैयारी है — भक्तिसूत्र भाग 2
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 4 — प्रकृति के आठ रूप और अहंकार का रहस्य
प्रेम माने क्या
प्रेम प्रेम सब कोइ कहे, प्रेम न चीन्हे कोय
ब्रह्म
जो मैं बोरा तो राम तोरा
राम भजा सो जीता जग में
राम बिन तन की ताप न जाई
निर्वाण षट्कम
श्री हरि स्तोत्रम्
चाहे ढूँढना जीवन का मतलब, न देखे है ब्रह्म सागर में
साधना
मन मस्त हुआ तब क्यों बोले
तेरा मेरा मनुआ कैसे एक होई रे
मेरी नैया पड़ी है मजधार
वारि जाऊँ मैं सतगुरु के
पिया मोर जागे मैं कैसे सोई री
अब नींद क्या है जब बन गया राम का मजदूर
प्रेम ही पथ है: भक्ति और ज्ञान की आंतरिक एकता — भक्तिसूत्र भाग 1
प्रेम न्यौछावर होने की तैयारी है — भक्तिसूत्र भाग 2
Maha Mrityunjaya Mantra
महामृत्युंजय मंत्र
आत्मज्ञान
राम भजा सो जीता जग में
मोको कहां ढूंढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में
पानी में मीन पियासी, मोहे सुन सुन आवत हाँसी
जग बौराना
चाहे ढूँढना जीवन का मतलब, न देखे है ब्रह्म सागर में
Ashtavakra Gita Chapter 8
अष्टावक्र गीता अध्याय 8
Shunyata Saptati
शून्यता सप्तति
Tao Te Ching
ताओ ते चिंग
आत्मा
अमरपुर ले चलो सजना
मोको कहां ढूंढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में
ना मैं धर्मी नाहिं अधर्मी
नैहरवा हमका न भावे
उड़ जायेगा हंस अकेला
मेरी नैया पड़ी है मजधार
घूँघट के पट खोल रे
मूर्खजग
नैहरवा हमका न भावे
जग बौराना
जगत में कैसा नाता रे
नहिं मानै मूढ़ गँवार, मैं कैसे कहूँ समझाय
पूछे लोग क्या बनना तुझे, क्या बनु इस जलती हुई दुनिया में
फिरत फिरत माया के पीछे, चाहे बोरे राम
दिनचर्या को माने दुख, जीवन को माने श्राप
बकरियाँ कटवाती है अपना गला, चाहे कटवाना मेरा भी गला
अहं
माटी कुदम करेंदी यार वाह वाह माटी दी गुलज़ार
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 4 — प्रकृति के आठ रूप और अहंकार का रहस्य