तेरा मेरा मनुआ कैसे एक होई रे

तेरा मेरा मनुआ कैसे एक होई रे।

मैं कहता आँखन की देखी, तू कहता कागद की लेखी।
मैं कहता सुरझावनहारी, तू राख्यो उरझाई रे।

मैं कहता हूँ जागत रहियो, तू जाता है सोई रे।
मैं कहता निरमोही रहियो, तू जाता है मोहि रे।

जुगन-जुगन समझावत हारा, कहा न मानत कोई रे।
तू तो रंगी फिरै बिहंगी, सब धन डारा खोई रे।

सतगुरु धारा निरमल बाहै, बा में काया धोई रे।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, तब ही वैसा होई रे।

~ कबीर साहब


“तेरा मेरा मनुआ कैसे एक होई रे।”
तेरे और मेरे मन का मिलन कैसे होगा, यह सोच रहा हूं।

“मैं कहता आँखन की देखी, तू कहता कागद की लेखी।
मैं कहता सुरझावनहारी, तू राख्यो उरझाई रे।”

मैं कहता हूं जो मैंने अपनी आँखों से देखा है,
तू कहता है जो कागज पर लिखा गया है।
मैं कहता हूं यह स्पष्ट करने वाला है,
तू इसे उलझा हुआ समझता है।

“मैं कहता हूँ जागत रहियो, तू जाता है सोई रे।
मैं कहता निरमोही रहियो, तू जाता है मोहि रे।”

मैं कहता हूं जागते रहो, तू सोने जाता है।
मैं कहता हूं निराकार प्रेम में रहो,
लेकिन तू फिर भी मोह में फंसा है।

“जुगन-जुगन समझावत हारा, कहा न मानत कोई रे।
तू तो रंगी फिरै बिहंगी, सब धन डारा खोई रे।”

प्रत्येक युग में समझाने वाला यही कहता है,
लेकिन कोई नहीं मानता।
तू रंगों में बसी हुई बगुले की तरह उड़ता है,
और सारी संपत्ति खोता है।

“सतगुरु धारा निरमल बाहै, बा में काया धोई रे।
कहत कबीर सुनो भाई साधो, तब ही वैसा होई रे।”

सतगुरु की धारा निरमल (शुद्ध) है,
वह तुम्हारी काया को धोकर शुद्ध कर देती है।
कबीर कहते हैं, सुनो साधो, तब ही तुम्हारे मन की शुद्धता होगी।


इस रूप में, कबीर साहब के भजन का अर्थ स्पष्ट है। वे हमें यह समझाते हैं कि सत्य और प्रेम को जानने के लिए हमें अहंकार और मोह से मुक्त होकर सतगुरु की शरण में जाना होगा। केवल उसी मार्ग पर चलकर हम अपने मन को शुद्ध कर सकते हैं।

updated_at 21-12-2025