वारि जाऊँ मैं सतगुरु के

वारि जाऊँ मैं सतगुरु के, किया मेरा भरम सब दूर।
चंद चढ़ा कुल आलम देखे, मैं देखूँ भरम दूर।।

हुआ प्रकाश आस गयी दूजी, उगिया निर्मल नूर।
माया मोह तिमिर सब नाशा, पाया हाले हुज़ूर।।

विषय विकार लार है जेता, किया सबकुछ धूर।
पिया पियाला सुधि–बुधि बिसरी, हुआ चकनाचूर।।

हुआ अमर मरैं नहीं कबहूँ, पाया जीवन मूल।
बंधन कटा छूटिया जम से, किया दरस मंजूर।।

ममता गई भई उर समता, सुख-दुख डारा दूर।
समझे बनै कहे नहीं आवै, भयो आनंद भरपूर।।

कहें कबीर सुनो भाई साधो, बाजिया निर्मल तूर।
वारि जाऊँ मैं सतगुरु के, किया मेरा भरम सब दूर।।

~ कबीर साहब


“वारि जाऊँ मैं सतगुरु के, किया मेरा भरम सब दूर।
चंद चढ़ा कुल आलम देखे, मैं देखूँ भरम दूर।”

मैं अपने सतगुरु पर न्योछावर हूँ — उन्होंने मेरा सारा भ्रम मिटा दिया।
चाँद के उगने पर सब संसार देखता है, मैं तो अपने भ्रम के मिटने को देखता हूँ।

आध्यात्मिक अर्थ:
सतगुरु बाहरी प्रकाश नहीं देते, दृष्टि को शुद्ध करते हैं।
जब भ्रम हटता है, तभी सत्य दिखता है।


“हुआ प्रकाश आस गयी दूजी, उगिया निर्मल नूर।
माया मोह तिमिर सब नाशा, पाया हाले हुज़ूर।”

अंतर में प्रकाश हुआ, दूसरी सारी आशाएँ छूट गईं।
माया–मोह का अँधेरा मिटा, प्रभु की निकटता का अनुभव हुआ।

आध्यात्मिक अर्थ:
जब भीतर का प्रकाश जागता है, बाहर की आस स्वतः गिर जाती है।
ईश्वर कहीं दूर नहीं — अज्ञान के हटते ही उपस्थित हो जाता है।


“विषय विकार लार है जेता, किया सबकुछ धूर।
पिया पियाला सुधि–बुधि बिसरी, हुआ चकनाचूर।”

विषय और विकार थूक के समान निकले, सब तुच्छ हो गया।
प्रेम का प्याला पिया, होश–बुद्धि भूल गई, सब टूट गया।

आध्यात्मिक अर्थ:
भोग तब तक आकर्षक है, जब तक रस भीतर नहीं जागता।
प्रेम का नशा अहंकार को चूर-चूर कर देता है।


“हुआ अमर मरैं नहीं कबहूँ, पाया जीवन मूल।
बंधन कटा छूटिया जम से, किया दरस मंजूर।”

मैं अमर हुआ — अब मृत्यु का भय नहीं रहा।
बंधन कटे, यम से छुटकारा मिला, दर्शन प्राप्त हुआ।

आध्यात्मिक अर्थ:
जो देह से परे अपने स्वरूप को जान लेता है, वही अमर है।
दर्शन बाहर का नहीं, आत्म-साक्षात्कार है।


“ममता गई भई उर समता, सुख-दुख डारा दूर।
समझे बनै कहे नहीं आवै, भयो आनंद भरपूर।”

ममता चली गई, हृदय में समता आ गई।
सुख–दुख दोनों छूटे, अवर्णनीय आनंद भर गया।

आध्यात्मिक अर्थ:
जहाँ समता है, वहाँ द्वंद्व नहीं टिकता।
सत्य समझ में आता है, शब्दों में नहीं।


“कहें कबीर सुनो भाई साधो, बाजिया निर्मल तूर।
वारि जाऊँ मैं सतगुरु के, किया मेरा भरम सब दूर।”

कबीर कहते हैं — साधुओ, सुनो, भीतर निर्मल नाद बज उठा है।
मैं सतगुरु पर न्योछावर हूँ — जिन्होंने मेरा सारा भ्रम मिटा दिया।

आध्यात्मिक अर्थ:
जब गुरु-कृपा से भीतर का नाद जागता है,
तो साधक नहीं बचता — केवल बोध रह जाता है।


सार

यह भजन गुरु की महिमा नहीं, गुरु-कृपा की साक्षी है।

यह कहता है —

“सतगुरु ने कुछ दिया नहीं,
बस जो झूठ था, उसे हटा दिया।”

भ्रम हटते ही
न माया बचती है,
न भय,
न मृत्यु।

केवल वही रह जाता है
जो सदा से था।