वारि जाऊँ मैं सतगुरु के — सच्चा गुरु कोन?
वारि जाऊँ मैं सतगुरु के – सत्र 1 अवलोकन
संत सरिता | 09 अक्टूबर, 2024
वारि जाऊँ मैं सतगुरु के,
किया मेरा भरम सब दूर।
सब बराबर क्यों हैं?
सब प्राकृति हैं; कोई ऊँचा या नीचा नहीं। जन्म या नियति किसी को विशेष नहीं बनाती। स्वतंत्रता और मुक्ति हर जीव के लिए समान रूप से उपलब्ध हैं।
क्या कोई ऊपर बैठा है जो हमें मुक्त करेगा?
नहीं। बुद्ध ने कहा: कोई भी बाहरी शक्ति मुक्ति नहीं देती। आप अपने प्रेमी या अपने दुश्मन बन सकते हैं; मुक्ति केवल भीतर से आती है।
गुरु क्या है?
गुरु भ्रम दूर करने वाला होता है, सिर्फ प्रभाव या पहचान नहीं। गुरु वही है जो अंधकार से प्रकाश में ले जाए। नकली गुरु दिखावा करता है, वास्तविक गुरु हाथ पकड़कर उठाता है।
भ्रम और आत्मज्ञान का क्या संबंध है?
सत्य से दूर होने की कोशिश ही भ्रम है। पहले भ्रम दूर होना चाहिए। आत्मज्ञान तथ्यों से जुड़े रहकर ही स्पष्ट होता है। नकली आदमी आपको तथ्यों से दूर ले जाता है और कामनाएँ जगाता है।
सामाजिक मान्यता वाला गुरु क्यों असली नहीं है?
सामाजिक पहचान, पद, पैसा या शक्ति गुरु नहीं बनाते। असली गुरु केवल ज्ञान और करुणा के साथ मार्ग दिखाता है।
सही शिष्य कौन है?
शिष्य वही है जो कठोर शिक्षा सह ले, गुरु की आलोचना सुनकर भागे नहीं, और ज्ञान के मार्ग पर टिक सके। कठिनाइयाँ उसे मार्ग से नहीं हटातीं। धन्य वही है जो चूर होने पर भी सीखता है।
वारि कब जाऊँ मैं सतगुरु के?
पहले भ्रम दूर करें। पहले गंदे पानी का नल साफ करें। जब भ्रम हट जाए, तभी गुरु के प्रकाश को समझना और उस पर भरोसा करना संभव है।
निष्कर्ष
सत्य तब मिलता है जब भ्रम दूर हो, तथ्य सामने हों, और करुणा साथ चले।
“वारि जाऊँ मैं सतगुरु के” तब ही सार्थक है जब सब भ्रम दूर हो, और आत्मा मुक्त हो।