माने क्या? प्रेम

प्रेम प्रेम सब कोइ कहे, प्रेम न चीन्हे कोय

प्रेम क्या है

  • प्रेम प्रेम सब कोइ कहे, प्रेम न चीन्हे कोय।
    जा मारग साहब मिले, प्रेम कहावे सोय।।
    (सब प्रेम की बात करते हैं, पर सच्चा प्रेम वही है जो सत्य तक ले जाए।)

  • आपा मेटे हरि मिले, हरि मेटे सब जाई।
    अकथ कहानी प्रेम की, कोई नहीं पतियाय।।
    (अहंकार मिटे तो परमात्मा मिलते हैं; ये अनकही कहानी कोई नहीं समझता।)

  • यह तो घर है प्रेम का, खाला का घर नाहिं।
    सीस उतारे भुईं धरे, तब बैठें घर माहिं।।
    (प्रेम आसान नहीं; इसमें अहंकार का सिर उतारना पड़ता है।)

  • पहले अगन बिरह की, पाछे प्रेम की पियास।
    कहें कबीर तब जानी लें, नाम मिलन की आस॥
    (पहले विरह की जलन होती है, फिर मिलन की सच्ची प्यास जन्म लेती है।)


प्रेम क्यों जरूरी है

  • माया दोय प्रकार की, जो कोय जाने खाय।
    एक मिलावे राम से, एक नरक ले जाय।।
    (माया दो तरह की है — एक सत्य से जोड़ती है, दूसरी भटका देती है।)

  • राम नाम कड़वा लगे, मीठा लागे दाम।
    दुविधा में दोनों गए, माया मिली ना राम।।
    (जो धन को मीठा और नाम को कड़वा समझता है, वह न दुनिया पाता है न परमात्मा।)

  • प्रेम बिना नहीं भेष कुछ, नाहक का संवाद।
    प्रेम भाव जब लग नहीं, तब लग बाद विवाद।।
    (प्रेम के बिना भक्ति और वेश सब व्यर्थ हैं; जहाँ प्रेम नहीं, वहाँ केवल बहस है।)

  • साईं इतना दीजिए, जा मे कुटुम समाय;
    मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाए।।
    (जीवन में उतना ही मिले जितना आवश्यक हो, ताकि स्वयं और साधु दोनों संतुष्ट रहें।)


प्रेम के निशानी

  • राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय।
    जो सुख साधू संग में, सो बैकुंठ ना होय।।
    (संत-संग का सुख स्वर्ग से भी बढ़कर है।)

  • प्रेम पियाला जो पिये, शीश दच्छिना देय।
    लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय।।
    (सच्चा प्रेम त्याग मांगता है; लोभी केवल नाम ले सकता है, समर्पण नहीं।)

  • बैद मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार।
    कबीरा ना मुआ, जाके राम आधार।।
    (जिसका आधार परमात्मा है, वह मृत्यु से परे है।)

  • जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाहीं।
    प्रेम गली अति सांकरी, जामें दो न समाहीं।।
    (जहाँ अहंकार है वहाँ परमात्मा नहीं; प्रेम में ‘मैं’ और ‘वह’ साथ नहीं रह सकते।)

  • साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय;
    सार-सार को गहि रहे, थोथा देइ उड़ाय।।
    (सच्चा साधु वही है जो अच्छी बात ग्रहण करे और व्यर्थ छोड़ दे।)


प्रेम किसके लिए है

  • कामी, क्रोधी, लालची, इनसे भक्ति न होए।
    भक्ति करे कोई सूरमा, जाति वरण कुल खोय।।
    (भक्ति वही कर सकता है जो वासना, क्रोध, लालच और अहंकार छोड़ दे।)

  • कबीर सोई सूरिमा, मन सूँ मांडै झूझ।
    पंच पयादा पाड़ि ले, दूरि करै सब दूज।।
    (असली वीर वह है जो अपने मन और पाँच विकारों को जीत ले।)

  • सतगुरु साँचा सूरमा, नख सिस्त्र मारा पूर;
    बाहर घाव न दीसई, भीतर चकनाचूर।।
    (सच्चा गुरु अहंकार को भीतर से तोड़ देता है, बाहर कुछ दिखता नहीं।)

  • सतगुरु साँचा सूरमा, सब्द जु बाह्या एक;
    लागत ही भय मिटि गया, पड़ा कलेजे छेक।।
    (गुरु का एक सच्चा वचन सीधे हृदय को बदल देता है।)

  • साधु सती और सूरमा, इनका मता अगाध;
    आशा छाड़े देह की, तिनमें अधिका साध।।
    (जो देह की आस छोड़ दे, वही गहरी साधना कर सकता है।)

  • साधु सती और सूरमा, कबहु न फेरे पीठ;
    तीनों निकासी बाहुरे, तिनका मुख नहीं दीठ।।
    (सच्चा साधक और वीर मार्ग से पीछे नहीं हटते।)

  • लख बर सुरा जूझ ही, लख बर सावंत देह;
    लख बर यति जहान में, तब सतगुरु शरणा लेह।।
    (चाहे कितने कर्म कर लो, अंत में गुरु की शरण ही आवश्यक है।)

  • पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
    ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।।
    (सिर्फ शास्त्र पढ़ने से ज्ञान नहीं मिलता; सच्चा ज्ञान प्रेम से आता है।)

प्रेम सीखना पड़ता है

  • [[कबीर के दोहे]]
  • [[प्रेम ही पथ है भक्ति और ज्ञान की आंतरिक एकता — भक्तिसूत्र भाग 1]]
  • [[प्रेम न्यौछावर होने की तैयारी है — भक्तिसूत्र भाग 2]]
  • [[प्रेम]]
  • [[खलक सब रैन का सपना सत्र 2 — कठिन है मोह की धारा, बहा सब जात संसारा#प्रेम क्या है|प्रेम क्या है]]
  • [[प्रेम माने क्या]]
  • [[श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6, श्लोक 47 — जो केवल कृष्ण को ही भजते हैं, वही सर्वश्रेष्ठ योगी हैं#प्रेम कैसे आएगा?|प्रेम कैसे आएगा]]
  • [[श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 6, श्लोक 47 — जो केवल कृष्ण को ही भजते हैं, वही सर्वश्रेष्ठ योगी हैं#“प्रेम गली अति साँकरी, तामें दो न समाही।”|प्रेम गली अति साँकरी, तामें दो न समाही]]