आत्मा

वेदान्त [[सनातन]] सत्य को आत्मा नाम देता है ।
सनातन है वह जो कल्पना के पार है, नाम के पार है, समय के पार है - वही आत्मा है ।

व्याख्या:
आत्मा कोई वस्तु, अनुभव या सत्ता नहीं है। यह अहं का अभाव है।

आत्मा को देखा नहीं जा सकता, क्योंकि देखने के लिए देखने वाला और देखी जाने वाली वस्तु—यह द्वैत आवश्यक है। जहाँ द्वैत है, वहाँ अहं है।

आत्मा प्राप्त करने की चीज़ नहीं है।
यह वह है जो तब शेष रहता है जब पहचान समाप्त हो जाती है।

आत्मा के लिए जो भी शब्द प्रयुक्त होते हैं—निर्गुण, निराकार, सर्वव्यापी—वे परिभाषा नहीं हैं, बल्कि निषेध हैं, ताकि अहं इसे वस्तु न बना सके।

आत्मा ≠ वस्तु
आत्मा ≠ विचार
आत्मा ≠ अनुभव

आत्मा = अनुभव करने वाले “मैं” का अभाव