आत्म-अवलोकन

आत्म अवलोकन 2 निकसि जब प्रान जावैंगे, कोई नहीं काम आवेंगे

आत्म-अवलोकन 2/100 (निकसि जब प्रान जावैंगे, कोई नहीं काम आवेंगे)

नमस्कार, आचार्या जी और सभी साथियों।

आज संत सरिता देखा और मेरे मन में यह प्रश्न उठा कि लोग एक-दूसरे को समझने में असमर्थ क्यों हैं? अपने-अपने कारणों, परिस्थितियों, स्मृतियों और केंद्रों के कारण वे बिल्कुल विपरीत कार्य करते हैं, फिर भी पूरे विश्वास से मानते हैं कि वही सही हैं।

आज मेरे घर में सुंदरकांड हो रहा था।

सुंदरकांड करना बहुत अच्छी बात है, लेकिन मुझे दुख इसका होता है कि जो भी सुंदरकांड में बैठा होता है, उन्हें हनुमान के मर्म को समझने में कोई दिलचस्पी नहीं होती।

उसी समय गीता का सत्र था। मैं सुंदरकांड छोड़कर गीता सत्र देखने लगा, क्योंकि उसकी ऊँचाई ज़्यादा है।

लेकिन एक बात मेरे भाई ने मुझसे कही—क्या ज़रूरी है, जो वापस लौटकर नहीं आएगा—सत्र या परिवार के साथ समय बिताना

सामाजिक लोग परिवार को महत्व देते हैं। साथ में समय बिताने को। 1000 सालों से ऐसा ही होता आया है। क्योंकि वहीं से लोग एक-दूसरे की सहायता करते हैं, वहीं से जीवन का अर्थ आता है, और वही सुख भी समझा जाता है।

एक समय था जब मेरे मुख से वचन काफी आते थे, क्योंकि मैं बकबक करने वाला था और काफी “funny” होने का शौक भी था। लेकिन अब वे सभी चीजें दूर-सी प्रतीत होती हैं। अब सिर्फ मौन रहता है।

जो भी वे बोलते हैं, उसमें मुझे ऊँचाई नहीं लगती, तो मैं ज़्यादातर शांत रहता हूँ या कम शब्द बोलता हूँ। और इस मौन के कारण उन्हें लगता है कि मुझे “दुनियादारी” नहीं आती। फिर मैं पूछता हूँ—”दुनिया” की परिभाषा बताओ—तो फिर वे मौन हो जाते हैं।

— जीवन की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि जीवन में जीवन नहीं।
— अहं कहता है: मेरा सम्मान ही मेरा जीवन है। मेरा संबंध ही मेरा जीवन है।

कितना अंतर है केंद्रों में। दोनों केंद्र विपरीत कार्य करते हुए भी अपने आप पर पूरा विश्वास रखते हैं कि वही सही हैं।

अगर यही केंद्र रहा, तो कभी धर्म की स्थापना नहीं हो पाएगी। “धर्म की स्थापना” माने ऐसा देश बनाना, जहाँ सबके केंद्र में ज्ञान हो, सबके केंद्र में आनंद हो, सब सत्य को उच्चतम मानें और कभी झूठ का साथ न दें, उनके हृदय में प्रेम हो—कृष्णत्व के लिए और सभी प्राणियों के लिए। अगर मैं utopia की बात कर रहा हूँ, तो हम dystopia में हैं।

मुझे नहीं पता कि लोगों से कैसे बात करनी चाहिए। मुझे नहीं पता कि लोगों का केंद्र कैसे बदला जा सकता है। जो कर रहे हैं, वही आचार्य जी कर रहे हैं, लेकिन लोकधर्मियों को लगता है कि वे ज़्यादा जानते हैं, और असल में उन्होंने पढ़ा कुछ नहीं है।

मैं नहीं कहूँगा कि मुझे कुछ बनने की ज़रूरत है या मुझे किसी विशेष तरह का चरण करना चाहिए। मेरे केंद्र में प्रेम है और कर्म उसकी अभिव्यक्ति मात्र है।

लेकिन वास्तविक धार्मिक लोग सबसे उच्चतम पैसे और ताकत के स्थानों पर होंगे, तभी कुछ बदलेगा। अहंकारी लोग सबसे ज़्यादा मेहनत कर सकते हैं, उससे वे रुतबे, पैसे और स्थानों पर पहुँच सकते हैं, तो वास्तविक धार्मिक व्यक्ति क्यों नहीं?

क्या तुम्हारा परिवार वही है, जहाँ तुमने जन्म लिया है?
या कृष्ण, बुद्ध, कबीर तुम्हारा परिवार हैं?

विषय शत्रु नहीं; विषय को जीवन मान लेना शत्रु है।
संबंध समस्या नहीं; संबंध में स्वयं को खो देना समस्या है।
अहं का होना समस्या नहीं; अहं को अंतिम सत्य मान लेना समस्या है।

#IndianPhilosophy #Lokdharma