जिस तन लगिया इश्क कमाल सत्र आत्म अवलोकन
आत्म-अवलोकन 1/100
नमस्कार, आचार्या जी और सभी साथियों।
सच कहूँ तो मुझे कभी नहीं लगा कि आत्म-अवलोकन लिखने से कुछ बदल जाएगा। मेरे हिसाब से ज्ञान को बस सुनना चाहिए, और जो आवश्यक है, उसका ग्रहण अपने आप हो जाता है।
लेकिन एक समस्या है—जब मैं लिखता हूँ, तो सोचने की गति धीमी पड़ जाती है; और जब नहीं लिखता, तो भविष्य में देखने के लिए कुछ बचता नहीं। फिर लगता है कि कोई प्रगति हुई ही नहीं। शायद इसी कारण आज बैठकर लिख रहा हूँ।
आज मैंने जिस तन लगिया इश्क कमाल सत्र फिर से सुना। यही वह सत्र था जिसने मुझे पहली बार इश्क़ का अर्थ समझाया था, और इसी के कारण मैं गीता सत्रों से जुड़ा।
मुझे वेदान्त के साथ-साथ कला में भी गहरी रुचि रही है। सच तो यह है कि वेदान्त और गीता मिशन के बारे में मुझे बहुत बाद में पता चला; शुरुआत में मेरा झुकाव कला की ओर अधिक था।
इंसान की मूल वृत्ति को देखकर मुझे हमेशा लगता था कि हम अपने अपरिहार्य अंत की ओर बढ़ रहे हैं। चाहे इस्राइल-फिलिस्तीन युद्ध हो, या बड़े व्यवसायों की जोंक जैसी प्रवृत्ति; राजनीति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कामना, मूर्खता और हिंसा; या फिर AI का आना—मुझे लगता था कि मनुष्य का अंत तय है।
मैं blockchain technology में था। मेरी उम्र लगभग 17 वर्ष थी जब मुझे वहाँ पर रुचि आई, और मुझे लगता था कि हम निश्चित रूप से एक perfect world बना सकते हैं। “web3” उस समय केवल technology नहीं, एक वादा था—एक ऐसी दुनिया जहाँ सब कुछ decentralized, distributed, trustless, permissionless होगा।
मुझे सच में विश्वास था कि मानवता सही दिशा में बढ़ रही है। उस समय मेरे भीतर जो जुनून था, आज भी उसकी याद बनी हुई है। तब उसके लिए मेरे पास कोई शब्द नहीं था, लेकिन अब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो उसे प्रेम कह सकता हूँ—ऊँचाई के लिए, लोकसंग्रह के लिए।
यही विश्वास मेरे सबसे बड़े टूटन का कारण बना।
Industry के भीतर जाकर समझ आया कि अधिकांश projects वास्तव में VC के नियंत्रण में थे। web3 उतना मुक्त नहीं था जितना बताया गया था। फिर AI आया, और स्पष्ट हो गया कि inequality उसी दिशा में बढ़ेगी, जिस दिशा में उसे बढ़ना है। idealism टूटने लगा।
जब समाज को देखता—नेताओं पर criminal cases, मनुष्यों का जानवरों की तरह लड़ना, हर कर्म में शूद्रता, युद्धों का चक्र, राज्यों का बनना और नष्ट होना—तो एक गहरी निरर्थकता अनुभव होती थी। ऊपर से ब्रह्मांड स्वयं भी किसी निश्चित अर्थ के साथ नहीं खड़ा दिखता था। अर्थ हम गढ़ते हैं, उद्देश्य हम बनाते हैं—तो फिर मैं जो भी करूँगा, वह भी अंततः निरर्थक ही होगा।
तब प्रश्न उठता था—मैं कौन होता हूँ AI को रोकने वाला? मैं क्यों कहूँ कि यदि AI मनुष्य को चिड़ियाघर में रख दे, तो वह गलत है?
इस्राइल-फिलिस्तीन युद्ध के दौरान मैंने सोशल मीडिया पर बच्चों के मृत शरीर देखे। उस समय मेरी आयु केवल 19 वर्ष थी। उस दृश्य ने भीतर से कुछ स्थायी रूप से तोड़ दिया। इंसानियत पर जो भरोसा बचा था, वह भी उठ गया।
मेरे पास कोई नहीं था जिससे यह सब कह सकता।
“हम एक perfect world बना सकते हैं, और हम सब उसकी ओर बढ़ रहे हैं”—यह विश्वास पूरी तरह टूट गया। उसी समय समझ आया कि मेरी सोच कितनी childish थी। मेरे भीतर के सारे ढाँचे एक साथ गिर गए।
मेरी गगरिया फूट गई।
मैंने web3 में projects बनाना लगभग छोड़ दिया। जो मेरा career होना चाहिए था, वही अर्थहीन लगने लगा। मुझे पूरा ब्रह्मांड एक मूर्खता के अलावा और कुछ नहीं दिखता था।
—प्रेम मुक्ति की घोषणा है।
—जब चेतना यह कहती है: “मेरे लिए मुक्ति से अधिक महत्वपूर्ण कुछ नहीं।”
—अहं का आत्मा की ओर आकर्षण ही इश्क़ है।
—झूठ का सच की ओर खिंचाव ही इश्क़ है।
ऊपरी तौर पर मेरा अहंकार कहता था—“मुझे क्या घंटा फर्क पड़ता है, सब हमेशा से तय था।”
चेहरे पर एक मुस्कान रहती थी, जैसे मैंने ब्रह्मांड का मूल जान लिया हो, जैसे मैं कोई ज्ञानी हूँ। लेकिन भीतर स्थिति बिल्कुल उलट थी। रातों की नींद प्रभावित होती थी। एक स्थायी अपूर्णता बनी रहती थी।
मैं कामना-रहित नहीं था; मैं निराश था।
मुझे लगता था कि दुनिया तो वैसे भी समाप्त हो जाएगी, तो इच्छा का क्या अर्थ? बाहर से एक झूठी शांति थी, भीतर लगातार संघर्ष।
मैंने बहुत पढ़ा—philosophy, nihilism, अस्तित्ववाद। धीरे-धीरे यह भ्रम बनने लगा कि अस्तित्वगत शून्यता को केवल मैं ही देख पा रहा हूँ, बाकी लोग उससे अनभिज्ञ हैं।
फिर भीतर प्रश्न उठते—
मैं ही क्यों?
अगर मैंने यह कभी न देखा होता तो?
अगर मैं भी एक सामान्य career जी पाता?
मैं सब भूलकर फिर से coding कैसे शुरू करूँ?
दरदमन्द नूं कोई न छेड़े, जिसने आपे दुःख सहेड़े।
जम्मणा जीणा मूल उखेड़े, बूझे अपणा आप खिआल।
धीरे-धीरे समझ आया कि सामान्य मनुष्य बाहरी समस्याओं में रुचि रखता है—उपलब्धि, संबंध, प्रतिष्ठा, सुरक्षा।
लेकिन प्रेमी का प्रश्न अलग होता है। वह पूछता है—दुःख किसको है? इच्छा किसकी है? जन्म किसका हुआ? यह “मैं” क्या है?
यहीं से समस्या संसार की नहीं, स्वयं की लगने लगती है।
Escapism के लिए मैंने anime देखना शुरू किया।
लेकिन जब मैंने Attack on Titan देखा, तो पहली बार लगा कि कला केवल मनोरंजन नहीं, दर्शन भी हो सकती है। जो उत्तर मैं ढूँढ रहा था, उसका एक स्वर वहाँ मिला। मानव-वृत्ति, हिंसा, स्वतंत्रता, अर्थ—मेरे भीतर जितने विरोधाभास थे, वे सब उसमें दिखाई दिए।
उसकी ending ने मुझे गहराई से प्रभावित किया—
“We get out of the forest. Maybe we’ll fail, but we still have to keep trying.”
बहुत समय बाद पहली बार कुछ देर के लिए भीतर शांति मिली।
मैं इतना प्रभावित हुआ कि मैंने स्वयं लिखना शुरू किया—संवाद, दृश्य, कहानियाँ। यहीं से लेखन शुरू हुआ।
लेकिन Attack on Titan ने मेरा केंद्र नहीं बदला। प्रश्न अभी भी वही था—
मेरा जन्म क्यों हुआ?
किस उद्देश्य से?
जीना ही क्यों है?
मृत्यु क्यों नहीं?
इन प्रश्नों का उत्तर मुझे बाद में मिला।
यदि किसी रचना ने मुझे सबसे अधिक प्रभावित किया, तो वह Vagabond थी। उसी समय मैंने ध्यान शुरू किया।
एक दिन मैं एक पत्ते को देख रहा था, और अचानक लगा—मेरे जीवन का उद्देश्य वही है जो उस पत्ते का है।
“सच कहूँ तो, जीवन का कोई मूल्य नहीं है। अगर आप सिर्फ़ अपने बारे में सोचते हैं, तो इसका कोई मूल्य नहीं है।
‘मेरा जन्म क्यों हुआ? किस उद्देश्य से?’
आप यहाँ इसलिए हैं, ताकि आप दूसरे जीवनों को सहारा दे सकें। अगर आप इस बात के विपरीत नहीं जाते कि जीवन कैसा होना चाहिए, तो आप पहले से ही पूरी तरह से स्वतंत्र हैं।” — Takuan, Vagabond
जिसने वेश इश्क़ दा कीता, धुर दरबारों फतवा लीता।
जदों हजूरों प्याला पीता, कुछ न रह्या सवाल-जवाब।
जिसदे अन्दर वस्स्या यार, उठिया यार ओ यार पुकार।
ना ओह चाहे राग न तार, ऐवें बैठा खेडे हाल।
मैंने अपने गुरु के नगर में सच पाया।
अब उनके कारण मैं केवल सच सुनना चाहता हूँ—सच के लिए।
आचार्या जी को देखना मैंने लगभग 20 वर्ष की आयु में शुरू किया। शुरुआत में बहुत कम, लेकिन समय के साथ जितना देखा, उतना ही जुड़ता गया।
और जब जिस तन लगिया इश्क कमाल सत्र YouTube पर देखा, तो लगा कि भीतर वास्तव में कुछ हिल गया है। उसी दिन मैंने गीता सत्र join किए। शायद अगस्त 2025 में।
आचार्या जी के बारे में क्या कहूँ?
उन्होंने मुझे नया जीवन नहीं दिया—उन्होंने पहली बार मुझे मेरा केंद्र दिखाया।
अहं और मन का बहुत-सा कचरा दिखाई देने लगा। अपूर्णता का स्वरूप समझ में आने लगा। दृष्टि बदलने लगी।
श्रीमद्भगवद्गीता, संत सरिता, कठोपनिषद, अष्टावक्र गीता, ऋभु गीता, ताओ ते चिंग, शून्यता सप्तति—इन सबको पहली बार केवल पढ़ा नहीं, जिया जा सकता है—यह समझ आया।
उन्होंने एक बात बहुत स्पष्ट की—
विषय चुनने से पहले देखो, चुनने वाला कौन है।
यदि चुनने वाला अहं है, तो परिणाम चाहे जैसा हो, बंधन होगा।
यदि चुनने वाला प्रेम है, तो वही साधना है।
गीता का सार मेरे लिए धीरे-धीरे यही बना—
—समस्या बाहर नहीं, मानव-वृत्ति में है।
अहं हमेशा दो विकल्प दिखाता है—A और B।
लेकिन वह तीसरा विकल्प छिपा देता है।
C का अर्थ कोई सुविधाजनक मध्य मार्ग नहीं है।
C का अर्थ है—दोनों विकल्पों से विरक्ति, और फिर प्रेम के अनदेखे मार्ग पर चलना।
तुम प्रकृति के हो जाओ।
अपने आप को खो दो।
संसाधन और काम अपने आप में गलत नहीं हैं—प्रश्न केवल इतना है कि उनका केंद्र क्या है।
—यदि केंद्र अहं है, तो बंधन।
—यदि केंद्र प्रेम है, तो वही मुक्ति की दिशा है।
कोई अंतिम अंत नहीं है।
अनंत यात्रा है।
बस बंधन मत बनाओ।
प्रेम रखो।
चलते जाओ।
बुल्ल्हिआ शाह नगर सच पाया, झूठा रौला सब्ब मुकाया।
सच्चियां कारण सच्च सुणाया, पाया उसदा पाक जमाल।
मेरा जीवन हमेशा एक नर्तक की तरह रहा है—सीधी, सधी हुई चाल में कभी सहज नहीं रहा।
मैं केवल एक चीज़ चाहता हूँ—पूर्ण समर्पण।
“राम, मुझे मुझसे बचा।”
यह वाक्य मेरे लिए प्रार्थना है, क्योंकि अहं किसी भी क्षण फिर से अज्ञान की ओर लौट सकता है।
मुझे लगता है कि मेरा स्वभाव मुझे वेदांतिक कला की ओर ले जा रहा है। कला और वेदान्त मेरे लिए अलग नहीं हैं। दोनों का मूल एक ही है—प्रेम।
मेरे केंद्र में आत्मा है, और कर्म उसकी अभिव्यक्ति मात्र है।
संसार पूछता है—“बिना कारण कोई कुछ क्यों करेगा?”
लेकिन प्रेमी का जीवन कारणरहित हो जाता है। उसका कर्म साधन नहीं रहता; वही उसका स्वभाव बन जाता है।
जिस तन लगिआ इश्क़ कमाल, नाचे बेसुर ते बेताल।
यह मैंने रात 12 बजे लिखना शुरू किया था, और अब सुबह के 8 बज गए हैं।
पता ही नहीं चला समय कहाँ चला गया।
यह आत्म-अवलोकन है या कथा—पता नहीं। लेकिन लिखते हुए अच्छा लगा, इसलिए डाल रहा हूँ।
शायद आचार्या जी पढ़ें, शायद नहीं। शायद गीता समागम में कोई देखे भी नहीं।
लेकिन मैं आशा करता हूँ कि इतना प्रेम भीतर बचा रहे कि मैं लिखता रहूँ, पिघलता रहूँ।
#IndianPhilosophy