बल
ऊर्जा → कामना → राग → क्षय
ऊर्जा → स्वतंत्रता → बल
बल का अर्थ केवल शारीरिक शक्ति नहीं है।
वास्तविक [[बल]] वह आंतरिक सामर्थ्य है जो व्यक्ति को सत्य के पक्ष में खड़ा होने देती है।
मनुष्य बलहीन इसलिए नहीं होता कि उसमें शक्ति कम है।
वह बलहीन इसलिए होता है क्योंकि उसकी ऊर्जा कामना, कल्पना और राग में खर्च हो जाती है।
इच्छा → कल्पना → थकान → दुर्बलता
इसलिए कृष्ण कहते हैं:
काम और राग से रहित बल ही वास्तविक बल है।
जहाँ पकड़ कम होती है, वहाँ शक्ति लौटती है।
बल जोड़ा नहीं जाता।
ऊर्जा को मुक्त किया जाता है।