प्रार्थना

माँग → अहंकार → नियंत्रण

समर्पण → अबिरोध → प्रार्थना

प्रार्थना माँग नहीं है।
सामान्यतः मनुष्य प्रार्थना को इच्छा-पूर्ति का साधन बना देता है। वह ईश्वर से भी अपने अहंकार की सुरक्षा चाहता है—सफलता, सुरक्षा, मान्यता, सुविधा।

यह प्रार्थना नहीं, विस्तारित स्वार्थ है।

वास्तविक प्रार्थना वहाँ शुरू होती है जहाँ “मैं” पीछे हटता है।

प्रार्थना = सत्य के सामने अहंकार का झुकना।

जब मन कहता है—
“मालिक, तू रहे; मैं न रहूँ”
तभी प्रार्थना जन्म लेती है।

यह आत्म-विनाश नहीं, [[अहं]]-विलोप है।

प्रार्थना का अर्थ है:

  • सत्य से आँख न हटे
  • सुविधा पर सत्य को चुना जाए
  • विरोध छोड़कर [[अबिरोध]] में आया जाए

प्रार्थना में माँग नहीं होती, दिशा होती है।

वास्तविक प्रार्थना का केंद्र है:

मैं बचूँ नहीं—सत्य बचे।